भगवान् भैरव रूप शिव स्तुति ९ - विनय पत्रिका ११ - तुलसीदास

भगवान् भैरव रूप शिव स्तुति
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका ११
भैरवरूप शिव-स्तुति ९
देव,
भीषणाकार,भैरव,भयंकर,भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति,विपति-हर्ता।
मोह-मूषक-मार्जार,संसार-भय-हरण,तारण-तरण,अभय कर्ता ॥ १ ॥
अतुल बल, विपुलविस्तार,विग्रहगौर, अमल अति धवल धरणीधराभं।
शिरसि संकुलित-कल-जूट पिंगलजटा, पटल शत-कोटि-विद्युच्छटाभं ॥ २ ॥
भ्राज विबुधापगा आप पावन परम, मौलि-मालेव शोभा विचित्रं।
ललित लल्लाटपर राज रजनीशकल, कलाधर,नौमि हर धनद-मित्रं ॥ ३ ॥
इंदु-पावक-भानु-नयन,मर्दन-मयन, गुण-अयन,ज्ञान-विज्ञान-रूपं।
रमण-गिरिजा,भवन भूधराधिप सदा, श्रवण कुंडल,वदनछवि अनूपं ॥ ४ ॥
चर्म-असि-शूल-धर,डमरु-शर-चाप-कर, यान वृषभेश,करुणा-निधानं।
जरत सुर-असुर,नरलोक शोकाकुलं, मृदुलचित,अजित,कृत गरलपानं ॥ ५ ॥
भस्म तनु-भूषणं,व्याघ्र-चर्माम्बरं, उरग-नर-मौलि उर मालधारी।
डाकिनी,शाकिनी,खेचरं,भूचरं, यंत्र-मंत्र-भंजन,प्रबल कल्मषारी ॥ ६ ॥
काल-अतिकाल,कलिकाल,व्यालादि-खग, त्रिपुर-मर्दन,भीम-कर्म भारी।
सकल लोकान्त-कल्पान्त शूलाग्र कृत दिग्गजाव्यक्त-गुण नृत्यकारी ॥ ७ ॥
पाप-संताप-घनघोर संसृति दीन, भ्रमत जग योनि नहिं कोपि त्राता।
पाहि भैरव-रूप राम-रूपी रुद्र,बंधु,गुरु,जनक,जननी,विधाता ॥ ८ ॥
यस्य गुण-गण गणति विमल मति शारधा,निगम नारद-प्रमुख ब्रह्मचारी।
शेष,सर्वेश,आसीन आनंदवन,दास टुलसी प्रणत-त्रासहारी ॥ ९ ॥
भावार्थ :- हे भीषणमूर्ति भैरव! आप भयंकर हैं। भूत, प्रेत और गणोंके स्वामी हैं। विपत्तियोंके हरण करनेवाले हैं। मोहरुपी चूहेके लिये आप बिलाव हैं; जन्म-मरणरुप संसारके भयको दूर करनेवाले हैं; सबको तारनेवाले, स्वयं मुक्तरूप और सबको अभय करनेवाले हैं ॥१॥ आपका बल अतुलनीय है तथा अति विशाल शरीर गौरवर्ण, निर्मल, उज्ज्वल और शेषनागकी-सी कान्तिवाला है। सिरपर सुन्दर पीले रंगका सौ करोड़ बिजलियोंके समान आभावाला जटाजूट शोभित हो रहा है ॥२॥
मस्तकपर मालाकी तरह विचित्र शोभावाली, परम पवित्र जलमयी देवनदी गंगा विराजमान है। सुन्दर ललाटपर चन्द्रमाकी कमनीय कला शोभा दे रही है, ऐसे कुबेरके मित्र शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य आपके नेत्र हैं; आप कामदेवका दमन करनेवाले हैं, गुणोंके भण्डार और ज्ञान-विज्ञानरुप हैं। पार्वतीके साथ आप विहार करते हैं और सदा ही पर्वतराज कैलास आपका भवन है। आपके कानोंमें कुण्डल हैं और आपके मुखकी सुन्दरता अनुपम है ॥४॥
आप ढाल, तलवार और शूल धारण किये हुए हैं; आपके हाथोंमें डमरु, बाण और धनुष हैं। बैल आपकी सवारी है और आप करुणाके खजाने हैं। आपकी करुणाका इसीसे पता लगता है कि आप समुद्रसे निकले हुए भयानक अजेय विषकी ज्वालासे देवता, राक्षस और मनुष्यलोकको जलता हुआ और शोकमें व्याकुल देखकर करुणाके वश होकर उसे स्वयं पी गये ॥५॥ भस्म आपके शरीरका भूषण है, आप बाघंबर धारण किये हुए हैं। आपने साँपों और नरमुण्डोंकी माला हदयपर धारण कर रखी है। डाकिनी, शाकिनी, खेचर (आकाशमें विचरनेवाली दुष्ट आत्माओं), भूचर (पृथ्वीपर विचरनेवाले भूत-प्रेत आदि) तथा यन्त्र-मन्त्रका आप नाश करनेवाले हैं। प्रबल पापोंको पलभरमें नष्ट कर डालते हैं ॥६॥
आप कालके भी महाकाल हैं, कलिकालरुपी सर्पोंके लिये आप गरुड़ हैं। त्रिपुरासुरका मर्दन करनेवाले तथा और बड़े-बड़े भयानक कार्य करनेवाले हैं। समस्त लोकोंके नाश करनेवाले महाप्रलयके समय अपनी त्रिशूलकी नोकसे दिग्गजोंको छेदकर आप गुणातीत होकर नृत्य करते हैं ॥७॥ इस पाप-सन्तापसे पूर्ण भयानक संसारमें मैं दीन होकर चौरासी लाख योनियोंमें भटक रहा हूँ, मुझे कोई भी बचानेवाला नहीं है। हे भैरवरुप! हे रामरुपी रुद्र! आप ही मेरे बन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता हैं। मेरी रक्षा कीजिये ॥८॥
जिनके गुणोंका निर्मल बुद्धिवाली सरस्वती, वेद और नारद आदि ब्रह्मज्ञानी तथा शेषजी सदा गान करते हैं, तुलसीदास कहते हैं, वे भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले सर्वेश्वर शिवजी आनन्दवन काशीमें विराजमान हैं ॥९॥
ध्यान दो :- तुलसीदास जी कहते है कि हे भैरवरुप! हे रामरुपी रुद्र! आप ही मेरे बन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता हैं। यहाँ तुलसीदास जी 'ही' शब्द का प्रयोग कर रहे है। यह आत्मा का भगवान् से सभी सम्बन्ध है और भगवान् ही आत्मा के सबकुछ है। यह शरीर के नाते है संसार से, यह शरीर जबतक तबतक संसारी रिश्ता है। लेकिन आत्मा सदा रहती है और भगवान् सदा रहते है अतएव आत्मा का परमात्मा से सदा सम्बन्ध है और सब सम्बन्ध है यह वेद पुराणों का उद्घोष भी है। इसीलिए भगवान् ही हमारे पिता, माता इत्यादि है।