भगवान् शिव स्तुति २ - विनय पत्रिका ४ - तुलसीदास

शिव स्तुति - विनयपत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका ४
राग धनाश्री
शिव स्तुति २
दानी कहुँ संकर-सम नाहीं।
दीन-दयालु दिबोई भावै,जाचक सदा सोहाहीं ॥ १ ॥
मारिकै मार थप्यौ जगमें,जाकी प्रथम रेख भट माहीं।
ता ठाकुरकौ रीझि निवाजिबौ,कह्यौ क्यों परत मो पाहीं ॥ २ ॥
जोग कोटि करि जो गति हरिसों,मुनि माँगत सकुचाहीं।
बेद-बिदित तेहि पद पुरारि-पुर,कीट पंतग समाहीं ॥ ३ ॥
ईस उदार उमापति परिहरि,अनत जे जाचन जाहीं।
तुलसिदास ते मूढ़ माँगने,कबहुँ न पेट अघाहीं ॥ ४ ॥
भावार्थ :- शंकर के समान दानी कहीं नहीं हैं। वे दीन दयालु हैं, देना ही उनके मन भाता है, माँगने वाले, उन्हें सदा सुहाते हैं ॥ १ ॥ वीरों में अग्नणी कामनदेव को भस्म करके फिर बिना ही शरीर जगत में उसे रहने दिया, ऐसे प्रभु का प्रसन्न होकर कृपा करना मुझसे क्योंकर कहा जा सकता है? ॥ २ ॥ करोड़ों प्रकार से योग की साधना करके मुनिगण जिस परम गति को भगवान् हरि से माँगते हुए सकुचाते हैं वही परम गति त्रिपुरारि शिव जी पुरी काशी में कीट - पतंग भी पा जाते हैं, यह वेदों से प्रकट है ॥ ३ ॥ ऐसे परम् उदार भगवान् पार्वतीपति को छोड़कर जो लोग दूसरी जगह माँगने जाते हैं, उन मुर्ख माँगने वालों का पेट भली भाँती कभी नहीं भरता ॥ ४ ॥
ध्यान दो :- यहाँ माँगना का आशय यह है कि जो व्यक्ति भगवान् से भगवान् संबंधी चीजे (प्रेम, शांति, भक्ति) साधन रहित होकर माँगते है उनकी कामना पूरी हो जाती है। परन्तु जो लोग भगवान् से संसार की चीजे माँगते है उनका पेट भली भाँती कभी नहीं भरता, इसका कारण यह है कि संसार की कोई भी चीज हो उससे आगे भी कोई न कोई है जैसे १० लाख से आगे २० लाख है, अतएव संसार की कामना आग में घी सम्मान है जिससे कामना बढ़ी है और भगवान् संबंधी जल है जिससे आग बुझती है। अतएव जो भगवान् से संसार माँगते है उनका पेट कभी नहीं भरता।