भगवान् शिव स्तुति ३ - विनय पत्रिका ५ - तुलसीदास

शिव स्तुति - विनयपत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका ५
शिव स्तुति ३
बावरो रावरो नाह भवानी।
दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, बेद-बडाई भानी ॥ १ ॥
निज घरकी बरबात बिलोकहु, हौ तुम परम सयानी।
सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी ॥ २ ॥
जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी।
तिन रंकनकौ नाक सँवारत, हौं आयो नकबानी ॥ ३ ॥
दुख-दीनता दुखी इनके दुख, जाचकता अकुलानी।
यह अधिकार सौपिये औरहिं, भीख भली मैं जानी ॥ ४ ॥
प्रेम-प्रसंसा-बिनय-ब्यंगजुत, सुनि बिधिकी बर बानी।
तुलसी मुदित महेस मनहिं मन, जगत-मातु मुसुकानी ॥ ५ ॥
भावार्थ :- (ब्रह्माजी लोगोंका भाग्य बदलते-बदलते हैरान होकर पार्वतीजीके पास जाकर कहने लगे) हे भवानी! आपके नाथ (शिवजी) पागल हैं। सदा देते ही रहते हैं। जिन लोगोंने कभी किसीको दान देकर बदले में पानेका कुछ भी अधिकार नहीं प्राप्त किया, ऐसे लोगोंको भी वे दे डालते हैं, जिससे वेदकी मर्यादा टूटती है ॥१॥ आप बड़ी सयानी है, अपने घरकी भलाई तो देखिये (यों देते-देते घर खाली होने लगा है, अनधिकारियोंको) शिवजीकी दी हुई अपार सम्पत्ति देख-देखकर लक्ष्मी और सरस्वती भी (व्यंगसे) आपकी बड़ाई कर रही हैं ॥२॥
जिन लोगोंके मस्तकपर मैंने सुखका नाम-निशान भी नहीं लिखा था, आपके पति शिवजीके पागलपनके कारण उन कंगालोंके लिये स्वर्ग सजाते-सजाते मेरे नाकों दम आ गया है ॥३॥ कहीं भी रहनेको जगह न पाकर दीनता और दुःखियोंके दुःख भी दुःखी हो रहे हैं और याचकता तो व्याकुल हो उठी है। लोगोंकी भाग्यलिपि बनानेका यह अधिकार कृपाकर आप किसी दूसरेको सौंपिये, मैं तो इस अधिकारकी अपेक्षा भीख माँगकर खाना अच्छा समझता हूँ ॥४॥ इस प्रकार ब्रह्माजीकी प्रेम, प्रशंसा, विनय और व्यंगसे भरी हुई सुन्दर वाणी सुनकर महादेवजी मन-ही-मन मुदित हुए और जगज्जननी पार्वती मुसकराने लगीं ॥५॥
ध्यान दो :- जो जीव भगवान् की उपासना (भक्ति) करके भगवान् को प्राप्त कर लेते है। तो गीता और वेद के सिद्धांत अनुसार भगवान् भक्त के संचित कर्म (अनंत जन्म के पाप पुण्य कर्म) को भगवान् समाप्त कर देते है। तो जब संचित कर्म समाप्त हो जाते है तब वो कर्म-बंधन से मुक्त हो जाते है। तो जब संचित कर्म समाप्त हो जाते है तब भक्त कर्म-बंधन से मुक्त हो जाते है। अतएव यह भगवान् का भोलापन कहो या पागलपन या कृपा कहो की जो केवल भक्ति अथवा शरणागति पर विभोर होकर उसके संचित कर्म समाप्त कर देते है। अन्यथा यह जीव अनंत जन्म तक, अनंत कर्म का फल भोगता रहे।