भगवान् शिव स्तुति ५ - विनय पत्रिका ७ - तुलसीदास

शिव स्तुति - विनयपत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका ७
शिव स्तुति ५
कस न दीनपर द्रवहु उमाबर। दारुन बिपति हरन करुनाकर ॥ १ ॥
बेद-पुरान कहत उदार हर। हमरि बेर कस भयेहु कृपिनतर ॥ २ ॥
कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज। होइ प्रसन्न दीन्हेहु सिव पद निज ॥ ३ ॥
जो गति अगम महामुनि गावहिं। तव पुर कीट पतंगहु पावहिं ॥ ४ ॥
देहु काम-रिपु ! राम -चरन-रति। तुलसिदास प्रभु ! हरहु भेद-मति ॥ ५ ॥
भावार्थ :- हे उमा - रमण! आप इस दीनपर कैसे कृपा नहीं करते? हे करुणाकी खानि! आप घोर विपत्तियोंके हरनेवाले हैं ॥१॥ वेद-पुराण कहते हैं कि शिवजी बड़े उदार हैं, फिर मेरे लिये आप इतने अधिक कृपण कैसे हो गये? ॥२॥
गुणनिधि नामक ब्राह्मणने आपकी कौन-सी भक्ति की थी, जिसपर प्रसन्न होकर आपने उसे अपना कल्याणपद दे दिया ॥३॥ जिस परम गतिको महान् मुनिगण भी दुर्लभ बतलाते हैं, वह आपकी काशीपुरीमें कीट - पतंगोंको भी मिल जाती हैं ॥४॥ हे कामारि शिव! हे स्वामी! तुलसीदासकी भेद-बुद्धि हरणकर उसे श्रीरामके चरणोंकी भक्ति दीजिये ॥५॥
ध्यान दो :- जो भेद-बुद्धि वाला जीव है उसको भगवान् अपनी शरण में नहीं लेते, ना ही प्रसन्न होते है और कृपा भी नहीं करते है। इसीलिए तुलसीदास जी भेद-बुद्धि को हरण करने की विनती कर रहे है।