भगवान् शिव स्तुति १ - विनय पत्रिका ३ - तुलसीदास

शिव स्तुति - विनयपत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका ३
शिव-स्तुति १
को जाँचिये संभु तजि आन। दीनदयालु भगत-आरति-हर,सब प्रकार समरथ भगवान ॥ १ ॥
कालकूट-जुर जरत सुरासुर,निज पन लागि किये बिष पान।
दारुन दनुज,जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही बान ॥ २ ॥
जो गति अगम महामुनि दुर्लभ,कहत संत,श्रुति,सकल पुरान।
सो गति मरन-काल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ॥ ३ ॥
सेवत सुलभ,उदार कलपतरु,पारबती-पति परम सुजान।
देहु काम-रिपु राम-चरन-रति,तुलसिदास कहँ कृपानिधान ॥ ४ ॥
भावार्थ :- भगवान् शिव जी को छोड़कर और किससे याचना की जाय? आप दीनों पर दया करने वाले, भक्तों के कष्ट हरने वाले और सब प्रकार से समर्थ ईश्वर है ॥ १ ॥ समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष की ज्वाला से सब देवता और राक्षस जल उठे, तब आप अपने दिनों पर दया करने के प्रण की रक्षा के लिये तुरंत उस विष को पी गये। जब दारुण दानव त्रिपुरासुर जगत् को बहुत दु:ख देने लगा, तब आपने उसको एक ही बाण से मार डाला ॥ २ ॥ जिस परम गति को संत-महात्मा, वेद और सब पुराण महान मुनियों के लिए भी दुर्लभ बताते हैं, हे सदाशिव! वही परमगति काशी में मरने पर आप सभी को समान भाव से देते हैं ॥ ३ ॥ हे पार्वतीपति! हे परम सुजान!! सेवा करने पर आप सहज में ही प्राप्त हो जाते हैं, आप कल्पवृक्ष के समान है मुँह माँगा फल देने वाले उदार हैं, आप कामदेव के शत्रु हैं। अतएव, हे कृपानिधान! तुलसीदास को श्रीराम के चरणों की प्रीति (प्रेम) दीजिये ॥ ४ ॥
ध्यान दो :- गोस्वामी तुलसीदास अभी तक (गणेश जी और सूर्य देव से) श्री राम की भक्ति का वर माँग रहे थे। परन्तु अब वो शिव जी से श्री राम जी का प्रीति (प्रेम) माँग रहे है। वास्तव में प्रेम और भक्ति एक चीज है। इसीलिए नारद भक्ति दर्शन को नारद प्रेम दर्शन भी कहा जाता है।