चित्रकूट स्तुति २ - विनय पत्रिका २४ - तुलसीदास

चित्रकूट स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका २४
राग कान्हरा
चित्रकूट स्तुति २
अब चित चेति चित्रकूटहि चलु।
कोपित कलि, लोपित मंगल मगु, बिलसत बढ़त मोह-माया-मलु ॥ १ ॥
भूमि बिलोकु राम-पद-अंकित, बन बिलोकु रघुबर-बिहारथलु।
सैल-सृंग भवभंग-हेतु लखु, दलन कपट-पाखंड-दंभ-डलु ॥ २ ॥
जहँ जनमे जग-जनक जगपति, बिधि-हरि परिहरि प्रपंच छलु।
सकृत प्रबेस करत जेहि आस्रम, बिगत-बिषाद भये पारथ नलु ॥ ३ ॥
न करु बिलंब बिचारु चारुमति, बरष पाछिले सम अगिले पलु।
मंत्र सो जाइ जपहि, जो जपि भे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु ॥ ४ ॥
रामनाम-जप जाग करत नित, मज्जत पय पावन पीवत जलु।
करिहैं राम भावतौ मनकौ, सुख-साधन, अनयास महाफलु ॥ ५ ॥
कामदमनि कामता,कलपतरु सो जुग-जुग जागत जगतीतलु।
तुलसी तोहि बिसेषि बूझिये, एक प्रतीति प्रीति एकै बलु ॥ ६ ॥
भावार्थ :- हे चित्त! अब तो चेतकर चित्रकूटको चल। कलियुगने क्रोध कर धर्म और ईश्वर भक्तिरुप कल्याणके मार्गोंका लोप कर दिया हैं; मोह, माया और पापोंकी नित्य वृद्धि हो रही हैं ॥१॥ चित्रकूटमें श्रीरामजी के चरणोंसे चिहिनत भूमिका और उनके विहारके स्थान वनका दर्शन कर! वहाँ कपट, पाखण्ड और दम्भके दल (समूह) का नाश करनेवाले पर्वतके उन शिखरोंको देख, जो जन्म-मरणरुप संसारसे छुटकारा मिलनेके कारण हैं ॥२॥
जहाँ पर जगत्पिता जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिवने सती अनसूयाके पुत्ररुपसे प्रपंच और छल छोड़कर जन्म लिया है। जिस चित्रकूटरुपी आश्रममें एक बार प्रवेश करते ही जुएमें हारकर वन- न भटकते हुए युधिष्ठिर आदि पाण्डव और राजा नलका सारा दुःख दूर हो गया ॥३॥
वहाँ जानेमें अब देर न कर, अपनी अच्छी बुद्धिसे यह तो विचार कर कि जितने वर्ष बीत गये सो तो गये, अब आयुके जितने पल बाकी हैं, वे बीते हुए वर्षोंके समान हैं। एक-एक पलको एक-एक वर्षके समान बहुमूल्य समझकर, मृत्युको समीप जानकर, जल्दी चित्रकूट जाकर उस श्रीराम-मन्त्रका जप कर, जिसे जपनेसे श्रीशिवजी कालकूट विष पीने पर भी अजर-अमर हो गये ॥४॥
जब तू वहाँ निरन्तर श्रीराम-नाम-जपरुपी सर्वश्रेष्ठ यज्ञ और पयस्विनी नदीके पवित्र जलमें स्नान तथा उसके जलका पान करता रहेगा, तब श्रीरामजी तेरी मनः कामना पूरी कर देंगे और इस सुखमय साधनसे सहजहीमें तुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - ये चारों फल दे देंगे ॥५॥
चित्रकूटमें जो कामतानाथ पर्वत है, वही मनोरथ पूर्ण करने वाली चिन्तामणि और कल्पवृक्ष है, जो युग-युग पृथ्वीपर जगमगाता है। यों तो चित्रकूट सभीके लिये सुखदायक है, परंतु हे तुलसीदास! तुझे तो विशेषरुपसे उसीके विश्वास, प्रेम और बलपर निर्भर रहना चाहिये ॥६॥
ध्यान दो - सभी संतों ने यही बात कही है कि जो बीत गया उसे जाने दो और अभी से ही आयु के जितने पल बाकी हैं, उन एक-एक पलको एक-एक वर्ष के समान बहुमूल्य समझकर, मृत्युको समीप जानकर, भगवान् नाम का मन से जप करना प्रारम्भ कर दो। यही बात तुलसीदास जी ने भी कही है।
संत महात्मा लोग ऐसा क्यों कहते है? इसका उत्तर यह है कि भगवत प्राप्ति पर भगवान् हमारे संचित कर्म (अनंत जन्म के पाप और पुण्य) को समाप्त (क्षमा) कर देते है। तो जब पिछला पाप पुण्य भगवान् समाप्त कर देंगे, तो उसके बारे में क्यों सोचे? हम जीव माया के आधीन तो है ही। माया (अज्ञान) की वजह से पाप करेंगे। जबतक माया रहेगी तबतक सब पापी है। तो अपने पाप को देखने के बजाय आगे की सोचो, भगवान् को प्राप्त करने की सोचो या उनकी सेवा करने की सोचो। जब भगवत प्राप्ति हो जाएगी, तो माया चली जाएगी, तो अब आप पाप पुण्य दोनों ही नहीं कर सकते। अब आप गुणातीत (सत्व, रज, तम से परे) कहलायेंगे। इसीलिए महापुरुष बीती बात को भूलकर, आगे क्या करना है उस पर विचार करने को कहते है।
तुलसीदास जी की एक बात ध्यान देने योग्य है। तुलसीदास जी कहते है कि निरन्तर श्रीराम-नाम-जपरुपी सर्वश्रेष्ठ यज्ञ करते रहना है, जब यह यज्ञ पूरा हो जायेगा तो भगवान् श्री राम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - ये चारों फल दे देंगे। तुलसीदास जी यह इशारा कर रहे है कि देखों श्रीराम नाम मन से निरन्तर लेना होगा तब यह फल मिलेगा। मन से जप इसलिए, क्योंकि ब्रह्मबिन्दूपनिषद् २ 'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।' भावार्थ :- मन ही कर्म बंधन और मोक्ष का कारण है। तो जब राम नाम मन से लेंगे तो मन शुद्ध होगा और मन शुद्ध होते ही, भगवत कृपा से माया जायेगी और फिर मोक्ष (कर्म बंधन से मुक्ति) मिलेगी।