देवी स्तुति १ - विनय पत्रिका १५ - तुलसीदास

देवी स्तुति - विनय पत्रिका

॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका १५
राग मारू
देवी स्तुति १
दुसह दोष-दुख, दलनि, करु देवि दाया।
विश्व-मूलाऽसि, जन-सानुकूलाऽसि, कर शूलधारिणि महामूलमाया ॥ १ ॥
तडित गर्भाङ्ग सर्वाङ्ग सुन्दर लसत, दिव्य पट भव्य भूषण विराजैं।
बालमृग-मंजु खंजन-विलोचनि, चन्द्रवदनि लखि कोटि रतिमार लाजैं ॥ २ ॥
रूप-सुख-शील-सीमाऽसि, भीमाऽसि, रामाऽसि, वामाऽसि वर बुद्धि बानी।
छमुख हेरंब-अंबासि, जगदंबिके, शंभु-जायासि जय जय भवानी ॥ ३ ॥
चंड-भुजदंड-खंडनि, बिहंडनि महिष मुंड-मद-भंग कर अंग तोरे।
शुंभ-निःशुंभ कुम्भीश रण-केशरिणि, क्रोध-वारीश अरि-वृन्द बोरे ॥ ४ ॥
निगम-आगम-अगम गुर्वि! तव गुन-कथन, उर्विधर करत जेहि सहसजीहा।
देहि मा, मोहि पन प्रेम यह नेम निज, राम घनश्याम तुलसी पपीहा ॥ ५ ॥
भावार्थ :- हे देवि! तुम दुःसह दोष और दुःखोंको दमन करनेवाली हो, मुझपर दया करो। तुम विश्व-ब्रह्माण्डकी मूल (उत्पत्ति स्थान) हो, भक्तोंपर सदा अनुकूल रहती हो, दुष्टदलनके लिये हाथमें त्रिशूल धारण किये हो और सृष्टिकी उत्पत्ति करनेवाली मूल (अव्याकृत) प्रकृति हो ॥१॥ तुम्हारे सुन्दर शरीर के समस्त अंगोंमें बिजली सी चमक रही है, उनपर दिव्य वस्त्र और सुन्दर आभूषण शोभित हो रहे हैं। तुम्हारे नेत्र मृगछौने और खंजनके नेत्रोंके समान सुन्दर हैं, मुख चन्द्रमाके समान है, तुम्हें देखकर करोड़ों रति और कामदेव लज्जित होते हैं ॥२॥
तुम रुप, सुख और शीलकी सीमा हो; दुष्टोंके लिये तुम भयानक रुप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं लक्ष्मी, तुम्हीं पार्वती और तुम्हीं श्रेष्ठ बुद्धिवाली सरस्वती हो। हे जगज्जननि! तुम स्वामिकार्तिकेय और गणेशजीकी माता हो और शिवजीकी गृहिणी हो; हे भवानी! तुम्हारी जय हो, जय हो ॥३॥ तुम चण्ड दानवके भुजदण्डोंका खण्डन करनेवाली और महिषासुरको मारनेवाली हो, मुण्ड दानवके घमण्डका नाश कर तुम्हींने उसके अंग-प्रत्यंग तोड़े हैं। शुंभ-निशुंभरुपी मतवाले हाथियोंके लिये तुम रणमें सिंहिनी हो। तुमने अपने क्रोधरुपी समुद्रमें शत्रुओंके दल- के-दल डुबो दिये हैं ॥४॥
वेद, शास्त्र और सहस्त्र जीभवाले शेषजी तुम्हारा गुणगान करते हैं; परन्तु उसका पार पाना उनके लिये बड़ा कठिन है। हे माता! मुझ तुलसीदासको श्रीरामजीमें वैसा ही प्रण, प्रेम और नेम दो, जैसा चातकका श्याम मेघमें होता है ॥५॥
ध्यान दो - यह भगवान् ही स्त्री रूप में है अर्थात भगवान् ही दुर्गा, राधा, भवानी इत्यादि बने है। वेद कहता है ब्रह्मोपनिषत् १.४.३ ❛स एकाकी न रमते। स द्वितीयमैच्छत्।❜ भावार्थ - 'भगवान् अकेले थे, अकेले मन नहीं लगा तो दो बन गए।' सुबालोपनिषत् २.१ ❛आत्मानं द्विधाकरोदर्धेन स्त्री अर्धेन पुरुषो❜ भावार्थ - 'भगवान् को आधा कर दो एक स्त्री और एक पुरुष।' पद्म पुराण में कहा कि राधा के अंश के अंश है दुर्गा, कमला, ब्राह्मणी आदि। और राधा रानी के चरण से करोणों विष्णु पैदा होते हैं। इसका अर्थ ये मत लगाना की ये राधा विष्णु शंकर अलग-अलग है। ये सब लोग एक ही है।
राधोपनिषद ❛राधाकृष्णयोरेकमासनम्। एका बुद्धि:। एकं मनः। एकं ज्ञानम्। एक आत्मा। एकं पदम् । एका आकृति:। एकं ब्रह्म।❜ भावार्थ - 'राधा-कृष्ण के एक ही मन है, एक ही बुद्धि है, एक ही ज्ञान है, एक ही आत्मा है, एक ही आकृति है (हम माया धिन मनुष्य को राधा कृष्ण के दो शरीर दिखाई पड़ते है, परतु वातविक सिद्ध महापुरुष या संत या गुरु या भक्त को दोनों एक ही दिखई पड़ते है), एक ही ब्रह्म (भगवान्) है' अस्तु तो एक ही दो बन गया है तो अंतर क्या होगा। श्री कृष्ण ने महारास में अनंत रूप धारण किया था।