देवी स्तुति २ - विनय पत्रिका १६ - तुलसीदास

देवी स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय-पत्रिका १६
राग रामकली
देवी स्तुति २
जय जय जगजननि देवि सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि,
भुक्ति-मुक्ति-दायनी, भय-हरणि कालिका।
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्वशर्वरीश-वदनि,
ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरणमालिका ॥ १ ॥
वर्म, चर्म कर कृपाण, शूल-शेल-धनुषबाण,
धरणि,दलनि दानव-दल,रण-करालिका।
पूतना-पिंशाच-प्रेत-डाकिनी-शाकिनी-समेत,
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥ २ ॥
जय महेश-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी,
समस्त-लोक-स्वामिनी,हिमशैल-बालिका।
रघुपति-पद परम प्रेम,तुलसी यह अचल नेम,
देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ॥ ३ ॥
भावार्थ :- हे जगतकी माता! हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो। देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम भोग और मोक्ष दोनोंको ही देनेवाली हो। भक्तोंका भय दूर करनेके लिये तुम कालिका हो। कल्याण, सुख और सिद्धियोंकी स्थान हो। तुम्हारा सुन्दर मुख पूर्णिमाके चन्द्रके सदृश है। तुम आध्यात्मिक, आधिभौतिक ओर आधिदैविक तापरुपी अन्धकारका नाश करनेके लिये मध्याह्नके तरुण सूर्यकी किरण-माला हो ॥१॥
तुम्हारे शरीरपर कवच है। तुम हाथोंमें ढाल-तलवार, त्रिशूल, साँगी और धनुष-बाण लिये हो। दानवोंके दलका संहार करनेवाली हो, रणमें विकरालरुप धारण कर लेती हो। तुम पूतना, पिशाच, प्रेत और डाकिनीशाकिनियोंके सहित भूत, ग्रह और बेतालरुपी पक्षी और मृगोंके समूहको पकड़नेके लिये जालरुप हो ॥२॥
हे शिवे! तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अनेक रुप और नाम हैं। तुम समस्त संसारकी स्वामिनी और हिमाचलकी कन्या हो। हे शरणागतकी रक्षा करनेवाली! मैं तुलसीदास श्रीरघुनाथजी के चरणोंमें परम प्रेम और अचल नेम चाहता हूँ, सो प्रसन्न होकर मुझे दो और मेरी रक्षा करो ॥३॥
ध्यान दो - भगवान के बारे में कहा जाता है कि भगवान के अनेक नाम, रूप और संसार के वो स्वामी है। यही बात तुलसीदास जी ने पार्वती जी के बारे में कहा है कि तुम्हारे अनेक रुप और नाम हैं। तुम समस्त संसारकी स्वामिनी हो। यह भगवान् ही स्त्री रूप में है अर्थात भगवान् ही दुर्गा, राधा, भवानी इत्यादि बने है।
संसार में सभी लोग भगवान् से धन दौलत मांगते है। लेकिन जो भक्त है वो संसार नहीं मांगते, वो भगवान् का किसी भी प्रकार से प्रेम, सेवा ही मांगते है।