गंगा स्तुति ४ - विनय पत्रिका २० - तुलसीदास

गंगा स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका २०
गंगा स्तुति ४
ईस-सीस बससि, त्रिपथ लससि, नभ-पताल-धरनि।
सुर-नर-मुनि-नाग-सिद्ध-सुजन मंगल-करनि ॥ १ ॥
देखत दुख-दोष-दुरित-दाह-दारिद-दरनि।
सगर-सुवन साँसति-समनि,जलनिधि जल भरनि ॥ २ ॥
महिमाकी अवधि करसि बहु बिधि हरि-हरनि।
तुलसी करु बानि बिमल, बिमल बारि बरनि ॥ ३ ॥
भावार्थ :- हे गंगाजी! तुम शिवजीके सिरपर विराजती हो; आकाश, पाताल और पृथ्वी-इन तीनों मार्गोंसे बहती हुई शोभायमान होती हो। देवता, मनुष्य, मुनि, नाग, सिद्ध और सज्जनोंका तुम कल्याण करती हो ॥१॥
तुम देखते ही दुःख, दोष, पाप, ताप और दरिद्रताका नाश कर देती हो। तुमने सगरके साठ हजार पुत्रोंको यम-यातनासे छुड़ा दिया। जलनिधि समुद्रमें तुम सदा जल भरा करती हो ॥२॥
ब्रह्माके कमण्डलुमें रहकर, विष्णुके चरणसे निकलकर और शिवजीके मस्तकपर विराजकर तुम्हींने तीनोंकी महिमा बढ़ा रखी है। हे गंगाजी! जैसा तुम्हारा निर्मल पापनाशक जल है, तुलसीदासकी वाणीको भी वैसी ही निर्मल बना दो, जिससे वह सर्वपापनाशक रामचरितका गान कर सके ॥३॥
ध्यान दो - यहाँ भी तुलसीदास जी माँ गंगाजी को 'तुम' शब्द से पुकार रहे है। वास्तव में तुम शब्द से किसी का सम्मान या अपमान नहीं होता। सम्मान अपमान मन से होता है।