यमुना स्तुति - विनय पत्रिका २१ - तुलसीदास

यमुना स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका २१
राग बिलावल
यमुना स्तुति
जमुना यों ज्यों ज्यों लागी बाढ़न।
त्यों त्यों सुकृत-सुभट कलि भूपहिं, निदरि लगे बहु काढ़न ॥ १ ॥
ज्यों ज्यों जल मलीन त्यों त्यों जमगन मुख मलीन लहै आढ़ न।
तुलसिदास जगदघ जवास ज्यों अनघमेघ लगे डाढ़न ॥ २ ॥
भावार्थ :- यमुनाजी ज्यों-ज्यों बढ़ने लगीं, त्यों-त्यों पुण्यरुपी योद्धागण कलियुगरुपी राजाकी निरादर करते हुए उसे निकालने लगे ॥१॥
बरसातमें यमुनाजीका जल बढ़कर ज्यों-ज्यों मैला होने लगा, त्यों-त्यों यमदूतोंका मुख भी काला होता गया। अन्तमें उन्हें कोई भी आसरा नहीं रहा, अब वे किसको यमलोकमें ले जायँ? तुलसीदास कहते हैं यमुनाजीके बढ़ते ही पुण्यरुपी मेघने संसारके पापरुपी जवासेको जलाकर भस्म कर डाला ॥२॥