भरत स्तुति - विनय पत्रिका ३९ - तुलसीदास

भरत स्तुति - विनयपत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३९
भरत स्तुति
जयति
भूमिजा-रमण-पदकंज-मकरंद-रस-
  रसिक-मधुकर भरत भूरिभागी।
भुवन-भूषण, भानुवंश-भूषण, भूमिपाल-
  रामचंद्रानुरागी ॥ १ ॥
जयति विबुधेश-धनदादि-दुर्लभ-महा-
 राज-संम्राज-सुख-पद-विरागी।
खड्ग-धाराव्रती-प्रथमरेखा प्रकट
 शुद्धमति-युवति पति-प्रेमपागी ॥ २ ॥
जयति निरुपाधि-भक्तिभाव-यंत्रित-ह्रदय,
  बंधु-हित चित्रकुटाद्रि-चारी।
पादुका-नृप-सचिव, पुहुमि-पालक परम
  धरम-धुर-धीर, वरवीर भारी ॥ ३ ॥
जयति संजीवनी-समय-संकट हनूमान
  धनुबान-महिमा बखानी।
बाहुबल बिपुल परमिति पराक्रम अतुल,
  गूढ गति जानकी-जानि जानी ॥ ४ ॥
जयति रण-अजिर गन्धर्व-गण-गर्वहर,
  फिर किये रामगुणगाथ-गाता।
माण्डवी-चित्त-चातक-नवांबुद-बरन,
  सरन तुलसीदास अभय दाता ॥ ५ ॥
भावार्थ :- बड़े भाग्यवान श्रीभरतजीकी जय हो, जो जानकीपति श्रीरामजीके चरण-कमलोंके मकरन्दका पान करनेके लिये रसिक भ्रमर हैं। जो संसारके भूषणस्वरुप, सूर्यवंशके विभूषण और नृप-शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीके पूर्ण प्रेमी हैं ॥१॥
भरतजीकी जय हो, जिन्होंने इन्द्र, कुबेर आदि लोकपालोंको भी जो अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसे महान् सुखप्रद महाराज्य और साम्राज्यसे मुख मोड़ लिया। जिनका सेवा-व्रत तलवारकी धारके समान अति कठिन हैं, ऐसे सत् पुरुषोंमें भी जो सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं और जिनकी शुद्ध बुद्धिरुपी तरुणी स्त्री श्रीरामरुपी स्वामीके प्रेममें लवलीन हैं ॥२॥
भरतजीकी जय हो, जो निष्कपट भक्तिभावके अधीन होकर प्रिय भाई श्रीरामचन्द्रजीके लिये चित्रकूट-पर्वत पैदल गये, जो श्रीरामजीकी पादुकारुपी राजाके मन्त्री बनकर पृथ्वीका पालक करते रहे और जो राम-सेवारुपी परम धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले तथा बड़े भारी वीर हैं ॥३॥
श्रीलक्ष्मणजीको शक्ति लगनेपर संजीवनी बूटी लानेके समय, जब भरतजीके बाणसे व्यथित होकर हनुमानजी गिर पड़े तब उन्होंने जिन भरतजीके धनुष-बाणकी बड़ी बड़ाई की थी, जिनकी भुजाओंका बड़ा भारी बल है, जिनका अनुपम पराक्रम है, जिनकी गूढ़ गतिको श्रीजानकीनाथ रामजी ही जानते हैं ऐसे भरतजीकी जय हो ॥४॥
जिन्होंने रणांगणमें गन्धवोंका गर्व खर्व कर दिया और फिरसे उन्हें श्रीरामकी गुणगाथाओंका गानेवाला बनाया, ऐसे भरतजीकी जय हो। माण्डवीके चित्तरुपी चातकके लिये जो नवीन मेघवर्ण हैं, ऐसे अभय देनेवाले भरतजीकी यह तुलसीदास शरण हैं ॥५॥
ध्यान दो - भक्त कभी भी संसार, स्वर्ग मुक्ति नहीं चाहता। भागवत ३.२९.१३ 'सालोक्यसार्ष्टिसामीप्य सारूप्यैकत्वमप्युत' - अर्थात् सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य यह पाँचों मुक्तियों को श्रीकृष्‍ण के देने पर भी भक्त नहीं लेता। श्रीरामचरितमानस में श्री राम ने काकभुशुण्डि से कहा -
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि॥83 ख॥
-श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड
भावार्थ:- हे काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा संपूर्ण सुखों की खान मोक्ष,॥83 (ख)॥ अर्थात् श्री राम जी काकभुशुण्डि को सिद्धि से लेकर मोक्ष तक देने को तैयार है। लेकिन काकभुशुण्डि जी माना करते हुए कहा -
अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥84 क॥
-श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड
भावार्थ:- आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्ति को श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है॥84 (क)॥
अर्थात् भक्त तो मुक्ति तक नहीं चाहता है। वो केवल हरि-गुरु से विशुद्ध भक्ति चाहता है जिससे वो उनकी सेवा कर सके। इसी प्रकार भरत जी ने भी महान् सुखप्रद महाराज्य और साम्राज्यसे मुख मोड़ लिया क्योंकि एक भक्त यह नहीं चाहता है। जिसको राम का प्रेम मिल जाये उसको फिर कुछ नहीं चाहिए। वो तो राम के प्रेम में लवलीन रहते है।