हनुमत स्तुति ११ - विनय पत्रिका ३५ - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३५
हनुमत स्तुति ११
कटु कहिये गाढे परे, सुनि समुझि सुसाईं।
करहिं अनभलेउ को भलो, आपनी भलाई ॥ १ ॥
समरथ सुभ जो पाइये, बीर पीर पराई।
ताहि तकैं सब ज्यों नदी बारिधि न बुलाई ॥ २ ॥
अपने अपनेको भलो, चहैं लोग लुगाई।
भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ असुभ सगाई ॥ ३ ॥
बाँह बोलि दै थापिये, जो निज बरिआई।
बिन सेवा सों पालिये, सेवककी नाईं ॥ ४ ॥
चूक-चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई।
होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥ ५ ॥
बंदिछोर बिरुदावली, निगमागम गाई।
नीको तुलसीदासको, तेरियै निकाई ॥ ६ ॥
भावार्थ :- जब संकट पड़ता है, तभी अपने स्वामीको भला-बुरा कहा जाता है, और अच्छे स्वामी यह समझ-बूझकर अपनी भलाईसे उस बुरे सेवकका भी भला कर देते हैं ॥१॥ समर्थ, कल्याणकारी और ऐसे शूरवीरको पाकर जो दुसरोंकी विपत्तिमें सहायता देता है, सब लोग उस ओर ऐसे देखा करते हैं, जैसे समुद्रके पास नदियाँ बिना बुलिये ही दौड़-दौड़कर जाती हैं ॥२॥
संसारमें सभी स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी भलाई चाहते हैं, शुभ अशुभके नातेसे जो (देवता) जिसको अच्छा लगता है, वह उसी देवताको भजता है। मुझे तो एक तुम्हारा ही भरोसा है ॥३॥ जिसे जबरदस्ती अपने बलका भरोसा देकर रख लिया वह यदि तुम्हारी सेवा नहीं करता, तो भी उसे सेवककी तरह पालना चाहिये ॥४॥
भूल और चंचलता तो सब मेरी ही हैं; पर तुम बड़े हो, मुझ-जैसे अपराधियोंको क्षमा करनेमें ही तुम्हारी बड़ाई है। यह तो सभी जानते हैं कि आदर करनेसे नीच भी ढीठ हो जाता और नीचता करने लगता है ॥५॥ तुम बन्धनोंसे छुड़ानेवाले हो-तुम्हारा ऐसा सुयश वेद-शास्त्र गाते हैं। मुझ तुलसीदासका भला अब तुम्हारी भलाईसे ही होगा, अन्यथा मैं तो किसी भी योग्य नहीं हूँ ॥६॥
ध्यान दो - गुरु (हनुमान जी) ही भक्त (तुलसीदास) पर कृपा कर उन्हें भवसागर से पार कर सकते है। भगवान् तब भक्त से मिलते है जब भक्त का अंतःकरण (मन) शुद्ध हो जाता है। उससे पहले गुरु ही आपके अंतःकरण (मन) को शुद्ध करने का उपाय बताएगा, आपके खराब संस्कारों से लड़ेगा। फिर अंत में जब निर्मल हो जायेगा तब भगवान् मिलेंगे।
जैसे एक माँ बच्चे को ९ महीने पेट में पालती है फिर पैदा होने के बाद उसकी देखरेख करती है, पाखाना साफ करती है, बच्चे को नहलाती है। अब जब सारा काम बच्चे का माँ ने कर दिया तब पिता जी आते है और बच्चे को गोद में लेकर लाड़ प्यार करते है। इसीप्रकार माया के अधीन जीव के अंतःकरण (मन) को गुरु १००% शुद्ध करने में मदत करता है और जब १००% शुद्ध हो जाता है तब भगवान् आपको गले लगाते है। तुलसीदास जी लिखते है, श्रीरामचरितमानस सुंदरकाण्ड श्री राम कह रहे है- निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ भावार्थ:-जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते।