हनुमत स्तुति २ - विनय पत्रिका २६ - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका २६
हनुमत स्तुति २
जयति मर्कटाधीश , मृगराज-विक्रम, महादेव, मुद-मंगलालय, कपाली।
मोह-मद-क्रोध-कामादि-खल-संकुला, घोर संसार-निशि किरणमाली ॥ १ ॥जयति लसदंजनाऽदितिज, कपि-केसरी-कश्यप-प्रभव, जगदार्त्तिहर्त्ता।
लोक-लोकप-कोक-कोकनद-शोकहर, हंस हनुमान कल्यानकर्ता ॥ २ ॥
जयति सुविशाल-विकराल-विग्रह, वज्रसार सर्वांग भुजदण्ड भारी।
कुलिशनख, दशनवर लसत, बालधि बृहद, वैरि-शस्त्रास्त्रधर कुधरधारी ॥३ ॥
जयति जानकी-शोच-संताप-मोचन, रामलक्ष्मणानंद-वारिज-विकासी।
कीस-कौतुक-केलि-लूम-लंका-दहन, दलन कानन तरुण तेजरासी ॥ ४ ॥
जयति पाथोधि-पाषाण-जलयानकर, यातुधान-प्रचुर-हर्ष-हाता।
दुष्टरावण-कुंभकर्ण-पाकारिजित-मर्मभित्, कर्म-परिपाक-दाता ॥ ५ ॥
जयति भुवननैकभूषण, विभीषणवरद, विहित कृत राम-संग्राम साका।
पुष्पकारूढ़ सौमित्रि-सीता-सहित, भानु-कुलभानु-कीरति-पताका ॥ ६ ॥
जयति पर-यत्रंमंत्राभिचार-ग्रसन, कारमन-कूट-कृत्यादि-हंता।
शाकिनी-डाकिनी-पूतना-प्रेत-वेताल-भूत-प्रमथ-यूथ-यंता ॥ ७ ॥
जयति वेदान्तविद विविध-विद्या-विशद, वेद-वेदांगविद ब्रह्मवादी।
ज्ञान- विज्ञान-वैराग्य-भाजन विभो, विमल गुण गनति शुकनारदादी ॥ ८ ॥
जयति विश्व-विख्यात बानैत-विरुदावली, विदुष बरनत वेद विमल बानी।
दास तुलसी त्रास शमन सीतारमण संग शोभित राम-राजधानी ॥ ९ ॥
भावार्थ :- हे हनुमानजी! तुम्हारी जय हो। तुम बंदरोंके राजा, सिंहके समान पराक्रमी, देवताओंमें श्रेष्ठ, आनन्द और कल्याणके स्थान तथा कपालधारी शिवजीके अवतार हो। मोह, मद, क्रोध, काम आदि दुष्टोंसे व्याप्त घोर संसाररुपी अन्धकारमयी रात्रिके नाश करनेवाले तुम साक्षात् सूर्य हो ॥१॥ तुम्हारी जय हो। तुम्हारा जन्म अंजनीरुपी अदिति (देवमाता) और वानरोंमें सिंहके समान केसरीरुपी कश्यपसे हुआ है। तुम जगतके कष्टोंको हरनेवाले हो तथा लोक और लोकपालरुपी चकवा-चकवी और कमलोंका शोक नाश करनेवाले साक्षात् कल्याण-मूर्ति सूर्य हो ॥२॥
तुम्हारी जय हो। तुम्हारा शरीर बड़ा विशाल हैं और भयंकर यही, प्रतेक अंग व्रज के समान है, भुजदण्ड बड़े भरी है तथा वज्रके समान नख और सुन्दर दाँत शोभित हो रहे हैं। तुम्हारी पूँछ बड़ी लम्बी है, शत्रुओंके संहारके लिये तुम अनेक प्रकारके अस्त्र, शस्त्र और पर्वतोंको लिये रहते हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो। तुम श्रीसीताजीके शोक-सन्तापका नाश करनेवाले और श्रीराम-लक्ष्मणके आनन्दरुपी कमलोंको प्रफुल्लित करनेवाले हो। बन्दर-स्वभावसे खेलमें ही पूँछसे लंका जला देनेवाले, अशोक-वनको उजाड़नेवाले, तरुण तेजके पुंज मध्याह्नकालके सूर्यरुप हो ॥४॥
तुम्हारी जय हो। तुम समुद्रपर पत्थरका पुल बाँधनेवाले, राक्षसोंके महान् आनन्दके नाश करनेवाले तथा दुष्ट रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादके मर्म-स्थानोंको तोड़कर उनके कर्मोंका फल देनेवाले हो ॥५॥ तुम्हारी जय हो। तुम त्रिभुवनके भूषण हो, विभिषणको राम-भक्तिका वर देनेवाले हो और रणमें श्रीरामजीके साथ बड़े-बड़े काम करनेवाले हो। लक्ष्मण और सीताजीसहित पुष्पक-विमानपर विराजमान सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामजीकी कीर्ति-पताका तुम्हीं हो ॥६॥
तुम्हारी जय हो। तुम शत्रुओंद्वारा किये जानेवाले यन्त्र-मन्त्र ओर अभिचार (मोहनउच्चाटन आदि प्रयोगों तथा जादू-टोने) को ग्रसनेवाले तथा गुप्त मारणप्रयोग और प्राणनाशिनी कृत्या आदि क्रूर देवियोंका नाश करनेवाले हो। शाकिनी, डाकिनी, पूतना, प्रेत, वेताल, भूत और प्रमथ आदि भयानक जीवोंके नियन्त्रणकर्ता शासक हो ॥७॥ तुम्हारी जय हो। तुम वेदान्तके (उपनिषद् को) जाननेवाले, नाना प्रकारकी विद्याओंमें विशारद, चार वेद और छः वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) के ज्ञाता तथा शुद्ध ब्रह्मके स्वरुपका निरुपण करनेवाले हो। ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यके पात्र हो अर्थात् तुम्हीने इनको अच्छी तरहसे जाना है। तुम समर्थ हो। इसीसे शुकदेव और नारद आदि देवर्षि सदा तुम्हारी निर्मल गुणावली गाया करते हैं ॥८॥
तुम्हारी जय हो। तुम काल (दिन, घड़ी, पल आदि), त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम), कर्म (संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण) और मायाका नाश करनेवाले हो। तुम्हारा ज्ञानरुप व्रत सदा निश्चल है तथा तुम सत्यपरायण और धर्मका आचरण करनेवाले हो। सिद्ध, देवगण और योगिराज सदा तुम्हारी सेवा किया करते हैं। हे भव-भयरुपी अन्धकारका नाश करनेवाले सूर्य! यह दास तुलसी तुम्हारी शरण है ॥९॥