हनुमत स्तुति ५ - विनय पत्रिका २९ - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका २९
हनुमत स्तुति ५
जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी, केसरी-सुवन भुवनैकभर्ता।
दिव्यभूम्यंजना-मंजुलाकर-मणे, भक्त-संताप-चिंतापहर्ता ॥ १ ॥
जयति धमार्थ-कामापवर्गद, विभो ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी।
वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मव्रती, जानकीनाथ-चरणानुरागी ॥ २ ॥
जयति बिहगेश-बलबुद्धि-बेगाति-मद-मथन, मनमथ-मथन, ऊर्ध्वरेता।
महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-तिलक, गानगुण-गर्व-गंधर्व-जेता ॥ ३ ॥
जयति मंदोदरी-केश-कर्षण, विद्यमान दशकंठ भट-मुकुट मानी।
भूमिजा-दुःख-संजात रोषांतकृत-जातनाजंतु कृत जातुधानी ॥ ४ ॥
जयति रामायण-श्रवण-संजात-रोमांच, लोचन सजल, शिथिल वाणी।
रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर पाहि, दास तुलसी शरण, शूलपाणी ॥ ५ ॥
भावार्थ :- हे हनुमानजी! तुम्हारे जय हो। तुम पूर्ण आनन्दके समूह, वानरोंमें साक्षात् केसरी सिंह (बबर शेर), केसरीके पुत्र और संसारके एकमात्र भरण-पोषण करनेवाले हो। तुम अंजनीरुपे दिव्य भूमिकी सुन्दर खानिसे निकली हुई मनोहर मणि हो और भक्तोंके सन्ताप और चिन्ताओंको सदा नाश करते हो ॥१॥
हे विभो! तुम्हारी जय हो। तुम धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके देनेवाले हो, ब्रह्मलोकतकके समस्त भोग-ऐश्वर्योंमे वैराग्यवान् हो। मन, वचन और कर्मसे सत्यरुप धर्मके व्रतका पालन करनेवाले हो और श्रीजानकीनाथ रामजीके चरणोंके परम प्रेमी हो ॥२॥
तुम्हारी जय हो। तुम गरुड़के बल, बुद्धि और वेगके बड़े भारी गर्वको खर्व करनेवाले तथा कामदेवके नाश करनेवाले बाल-ब्रह्मचारी हो, तुम बड़े-बड़े नाटकोंके निर्माण और अभिनयमें निपुण हो, करोड़ों महाकवियोंके कुलशिरोमणि और गान-विद्याका गर्व करनेवाले विजय पानेवाले हो ॥३॥
तुम्हारी जय हो। तुम वीरोंके मुकुटमणि, महा अभिमानी रावणके सामने उसकी स्त्री मन्दोदरीके बाल खींचनेवाले हो। तुमने श्रीजानकीजीके दुःखको देखकर उत्पन्न हुए क्रोधके वश हो राक्षसियोंको ऐसा क्लेश दिया जैसा यमराज पापी प्राणियोंको दिया करता है ॥४॥
तुम्हारी जय हो। श्रीरामजीका चरित्र सुनते ही तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाता है, तुम्हारे नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आते हैं और तुम्हारी वाणी गदगद हो जाती है। हे श्रीरामके चरण-कमल-परागके रसिक भौंरे! हे हनुमान-रुपी त्रिशूलधारी शिव! यह दास तुलसी तुम्हारी शरण है, इसकी रक्षा करो ॥५॥
ध्यान दो - तुलसीदास जी शिव के अवतार और राम के परम भक्त हनुमान जी के बारे में कहा कि श्री रामजी का चरित्र सुनते ही तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाता है, तुम्हारे नेत्रों में प्रेम के आँसू भर आते हैं और तुम्हारी वाणी गदगद हो जाती है। यहाँ तुलसीदास जी एक भक्त के लक्षण भी बता रहे है। वैसे तो एक भक्त के अनेक लक्षण होते है, लेकिन नेत्रों में प्रेम के आँसू भर आना और वाणी गदगद हो जाना, यह भी एक महत्वपूर्ण लक्षण है।