हनुमत स्तुति ६ - विनय पत्रिका ३० - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३०
राग सारंग
हनुमत स्तुति ६
जाके गति है हनुमानकी।
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषानकी ॥ १ ॥
अघटित-घटन, सुघट-बिघटन,ऐसी बिरुदावलि नहिं आनकी।
सुमिरत संकट-सोच-बिमोचन, मूरति मोद-निधानकी ॥ २ ॥
तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लषन, राम अरु जानकी।
तुलसी कपिकी कृपा-बिलोकनि, खानि सकल कल्यानकी ॥ ३ ॥
भावार्थ :- जिसको (सब प्रकारसे) श्रीहनुमानजीका आश्रय है, उसकी प्रतिज्ञा पूरी हो ही गयी। यह सिद्धान्त वज्र (हीरे ) - की लकीरके समान अमिट है ॥१॥
क्योंकि श्रीहनुमानजी असम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाले हैं, ऐसे यशका बाना दुसरे किसीका भी नहीं हैं। श्रीहनुमानजीकी आनन्दमयी मूर्तिका स्मरण करते ही सारे संकट और शोक मिट जाते हैं ॥२॥
सब प्रकारके कल्याणोंकी खानि श्रीहनुमानजीका कृपादृष्टि जिसपर है, हे तुलसीदास! उसपर पार्वती, शंकर, लक्ष्मण, श्रीराम और जानकीजी सदा कृपा किया करती हैं ॥३॥
ध्यान दो - भगवान् कर्तुम अकर्तुम अन्यथा कर्तुम समर्थ हैं अर्थात् जो चाहें करें, जो चाहें न करें और जो चाहें उल्टा-पलटा करें, वो सबकुछ करने में समर्थ (सक्षम) है। यह बात तो सर्वविदित है कि हनुमान जी शिव जी के अवतार है, इस बात को तुलसीदास जी ने भी विनयपत्रिका (हनुमत स्तुति ५) में भी कहा है। अतएव हनुमान जी स्वयं भगवान् है और हमने आपको प्रमाणों द्वारा भी बताया के की भगवान् के सभी अवतार एक ही है। इसीलिए तुलसीदास जी श्री हनुमान जी को कह रहे है कि आप सम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाले हैं। क्योंकि श्री हनुमान जी भगवान् है।
यह भगवान् सम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको असम्भव कैसे करते है? यह एक प्रश्न है। इसका उत्तर है, भगवान् अपनी योग माया की शक्ति से यह कार्य करते है।