हनुमत स्तुति ७ - विनय पत्रिका ३१ - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३१
राग गौरी
हनुमत स्तुति ७
ताकिहै तमकि ताकी ओर को।
जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी-किसोरको ॥ १ ॥
जन-रंजन अरिगिन-गंजन मुख-भंजन खल बरजोरको।
बेद-पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुभट-सिरमोर को ॥ २ ॥
उथपे-थपन, थपे उथपन पन, बिबुधबृंद बँदिछोर को।
जलधि लाँघि दहि लंक प्रबल बल दलन निसाचर घोर को ॥ ३ ॥
जाको बालबिनोद समुझि जिय डरत दिवाकर भोरको।
जाकी चिबुक-चोट चूरन किय रद-मद कुलिस कठोरको ॥ ४ ॥
लोकपाल अनुकूल बिलोकिवो चहत बिलोचन-कोरको।
सदा अभय, जय, मुद-मंगलमय जो सेवक रनरोरको ॥ ५ ॥
भगत-कामतरु नाम राम परिपूरन चंद चकोरको।
तुलसी फल चारो करतल जस गावत गईबहोर को ॥ ६ ॥
भावार्थ :- जिसे सब प्रकारसे केसरीनन्दन श्रीहनुमानजीका भरोसा है, उसकी ओर भला क्रोधभरी दृष्टिसे कौन ताक सकता है? ॥१॥ हनुमानजीके समान भक्तोंको प्रसन्न करनेवाला, शत्रुओंका नाश करनेवाला, दुष्टोंका मुँह तोड़नेवाला बड़ा बलवान् संसारमें और कौन है  इनका पुरुषार्थ वेदों और पुराणोंमे प्रकट है। इनके समान समस्त शूरवीरोंमें शिरोमणि दूसरा कौन है? ॥२॥
इनके समान (सुग्रीव, विभीषण आदि) राज्यबहिष्कृतोंको पुनः स्थापित करनेवाला, सिंहासनपर स्थित (बालि, रावण आदि) राजाधिराजोंको राज्यच्युत करनेवाला, देवताओंको प्रण करके रावणके बन्धनसे छुड़ानेवाला, समुद्र लाँघकर लंकाको जलानेवाला और बड़े-बड़े बलवान् भयानक राक्षसोंके बलका नाश करनेवाला दूसरा कौन है? ॥३॥
जिनके बाल-विनोदको याद करके अब भी प्रातः कालके सूर्यदेव डरा करते हैं, जिनकी ठोड़ीकी चोटने कठोर वज्रके दाँतोंका घमंड चूर कर दिया ॥४॥ बड़े-बड़े लोकपाल भी जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, ऐसे रणबाँकुरे हनुमानजीकी जो सेवा करता है, वह सदा निडर रहता है, शत्रुओंपर विजयी होता है और संसारके सभी सुख तथा कल्याणरुप मोक्षको प्राप्त करता है ॥५॥
पूर्णकला-सम्पन्न चन्द्रमा जैसे श्रीरामचन्द्रजीके मुखको अनिमेष दृष्टिसे देखनेवाले चकोररुप हनुमानजीका नाम भक्तोंके लिये कल्पवृक्षके समान है। हे तुलसीदास! गयी हुई वस्तुको फिरसे दिला देनेवाले श्रीहनुमानजीका जो गुण गाता है, अर्थ, धर्म, काम, मोक्षरुप चारों फल सदा उसकी हथेलीपर धरे रहते हैं ॥६॥