हनुमत स्तुति ८ - विनय पत्रिका ३२ - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३२
राग बिलावल
हनुमत स्तुति ८
ऐसी तोही न बूझिये हनुमान हठीले।
साहेब कहूँ न रामसे, तोसे न उसीले ॥ १ ॥
तेरे देखत सिंहके सिसु मेंढक लीले।
जानत हौं कलि तेरेऊ मन गुनगन कीले ॥ २ ॥
हाँक सुनत दसकंधके भये बंधन ढीले।
सो बल गयो किधौं भये अब गरबगहीले ॥ ३ ॥
सेवकको परदा फटे तू समरथ सीले।
अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सही ले ॥ ४ ॥
साँसति तुलसीदासकी सुनि सुजस तुही ले।
तिहुँकाल तिनको भलौं जे राम-रँगीले ॥ ५ ॥
भावार्थ :- हे हठीले (भक्तोंके कष्ट बरबस दूर करनेवाले) हनुमान्! तुझे ऐसा नहीं चाहिये। श्रीराम-सरीखे तो कहीं स्वामी नहीं हैं और तेरे समान कहीं सहायक नहीं हैं ॥१॥
यह होते हुए भी आज तेरे देखते-देखते मुझ सिंहके बच्चेको (तुझ सिंहरुप सहायकके शरणागत मुझ बालकको) कलियुगरुपी मेंढक (जिसकी तेरे सामने कोई हस्ती नहीं हैं) निगले लेता है। मालूम होता है, इस कलियुगने तेरे भक्तवत्सलता, शरणागतकी रक्षाके लिये हठकारिता उदारता आदि गुणोंको कील दिया है ॥२॥
एक दिन तेरी हुंकार सुनते ही रावणके अंग-अंगके जोड़ ढीले पड़ गये थे, वह तेरा बल-पराक्रम आज कहाँ गया? अथवा क्या तू अब दयालुके बदले घमंडी हो गया है? ॥३॥ आज तेरे सेवकका पर्दा फट रहा है उसे तू सी दे-जाती हुई इज्जतको बचा दे, तू बड़ा समर्थ है, पहले तो तू सेवकको अपनेसे अधिक मानता, उसकी सुनता, सहता था, पर अब क्या हो गया? ॥४॥
इस तुलसीदासके संकटको सुनकर उसे दूर करके यह सुयश तू ही ले ले। वास्तवमें तो जो रामके रँगीले भक्त हैं उनका तीनों कालोंमें कल्याण ही है ॥५॥
ध्यान दो - यहाँ तुलसीदास जी माँ को 'तेरे और तू' शब्द से पुकार रहे है। वास्तव में 'तेरे और तू' शब्द से किसी का सम्मान या अपमान नहीं होता। सम्मान अपमान मन से होता है।