हनुमत स्तुति ९ - विनय पत्रिका ३३ - तुलसीदास

हनुमत स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३३
हनुमत स्तुति ९
समरथ सुअन समीरके, रघुबीर-पियारे।
मोपर कीबी तोहि जो करि लेहि भिया रे ॥ १ ॥
तेरी महिमा ते चलै चिंचिनी-चिया रे।
अँधियारो मेरी बार क्यो, त्रिभुवन-उजियारे ॥ २ ॥
केहि करनी जन जानिकै सनमान किया रे।
केहि अघ औगुन आपने कर डारि दिया रे ॥ ३ ॥
खाई खोंची माँगि मैं तेरो नाम लिया रे।
तेरे बल, बलि, आजु लौं जग जागि जिया रे ॥ ४ ॥
जो तोसों होतौ फिरौं मेरो हेतु हिया रे।
तौ कयों बदन देखावतो कहि बचन इयारे ॥ ५ ॥
तोसो ग्यान-निधान को सरबग्य बिया रे।
हौं समुझत साई-द्रोहकी गति छार छिया रे ॥ ६ ॥
तेरे स्वामी राम से, स्वामिनी सिया रे।
तहँ तुलसीके कौनको काको तकिया रे ॥ ७ ॥
भावार्थ :- हे सर्वशक्तिमान् पवनकुमार! हे रामजीके प्यारे! तुझे मुझपर जो कुछ करना हो सो भैया अबी कर ले ॥१॥ तेरे प्रतापसे इमलीके चियें भी (रुपये-अशरफीकी जगह) चल सकते हैं; अर्थात् यदि तू चाहि तो मेरे जैसे निकम्मोंकी भी गणना भक्तोंसे हो सकती हैं। फिर मेरे लिये, हे त्रिभुवनउजागर! इतना अँधेरा क्यों कर रखा है? ॥२॥
पहले मेरी कौन-सी अच्छी करनी जानकर तूने मुझे अपना दास समझा था तथा मेरा सम्मान किया था और अब किस पाप तथा अवगुणसे मुझे हाथसे फेंक दिया, अपनाकर भी त्याग दिया? ॥३॥ मैंने तो सदासे ही तेरे नामपर टुकड़ा माँगकर खाया है, तेरी बलैया लेता हूँ, मैं तो तेरे ही बलके भरोसेपर जगतमें उजागर होकर अबतक जीता रहा हूँ ॥४॥
एक दिन तेरी हुंकार सुनते ही रावणके अंग-अंगके जोड़ ढीले पड़ गये थे, वह तेरा बल-पराक्रम आज कहाँ गया? अथवा क्या तू अब दयालुके बदले घमंडी हो गया है? ॥३॥ आज तेरे सेवकका पर्दा फट रहा है उसे तू सी दे-जाती हुई इज्जतको बचा दे, तू बड़ा समर्थ है, पहले तो तू सेवकको अपनेसे अधिक मानता, उसकी सुनता, सहता था, पर अब क्या हो गया? ॥४॥
जो मैं तुझसे विमुख होता तो मेरा हदय ही उसमें कारण होता, फिर मैं निज परिवारके मनुष्यकी तरह भली-बुरी सुनाकर तुझे अपना मुँह कैसे दिखाता? ॥५॥ तू मेरे मनकी सब कुछ जानता है, क्योंकि तेरे समान ज्ञानकी खानि और सबके मनकी जाननेवाला दूसरा कौन है? यह तो मैं भी समझता हूँ कि स्वामीके साथ द्रोह करनेवालेको नष्ट-भ्रष्ट हो जाना पड़ता है ॥६॥
तेरे स्वामी श्रीरामजी और स्वामिनी श्रीसीताजी-सरीखी हैं, वहाँ तुलसीदासका तेरे सिवा और किस मनुष्यका और किस वस्तुका सहारा है? इसलिये तू ही मुझे वहाँतक पहुँचा दे ॥७॥
ध्यान दो - जब भक्त भगवान् की भक्ति करता है तो कभी-कभी जब उसे उसके भक्ति का फल नहीं मिलता तब वो बेचैन हो जाता है और भगवान् पर और उनके संत पर दोष भी लगाता है और उनसे कृपा भी चाहता है। लेकिन वो भक्त यह नहीं सोचता की वेद शास्त्र तो डंके की चोट पर कह रहे है की जब भक्त भगवान् की पूर्ण शरणागति करले तब भगवान् उसको अपना सब कुछ दे देते है। वो भक्त अपने दोष को न समझ कर भगवान् और गुरु पर दोष लगाता है। वह भक्त जानता है कि हरि-गुरु सर्वज्ञ है और मेरे कर्मों को जनता है, मेरे किसी पाप से ही वो मुझसे रूठे है। लेकिन वह भक्त यह नहीं समझ रहा है कि अगर गुरु मुझसे रूठे है इसका मतलब वो मुझे आपने मानते है और मेरे कल्याण के लिए ही रूठे है।
यहाँ पर तुलसीदास जी वैसे तो सिद्ध महापुरुष है, लेकिन हमारे विचार से वो लीला कर रहे है। वो भी हनुमान जी (गुरु है। क्योंकि हनुमान जी ने तुलसीदास जी को श्री राम से मिलाया है।) से कह रहे है कि तू अब दयालु के बदले घमंडी हो गया है, आज तेरे सेवक का पर्दा फट रहा है उसे तू सी दे-जाती हुई इज्जत को बचा दे, तू बड़ा समर्थ है, पहले तो तू सेवक को अपने से अधिक मानता, उसकी सुनता, सहता था, पर अब क्या हो गया? इत्यादि।
अंत में एक महत्वपूर्ण ज्ञान तुलसीदास जी के शब्दों में झलकता है। तुलसीदास जी ने कहा ॥७॥ में 'तू ही मुझे वहाँतक पहुँचा दे'। गुरु (हनुमान जी) ही भगवान् तक पंहुचा सकते है। गुरु का बहुत महत्व है। जैसे भौतिक विज्ञान में शिक्षक की आवश्यकता होती है वैसे है आध्यात्मिक ज्ञान में गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु के ज्ञान से भक्त भक्ति करना जनता है और भगवान् तक पहुँचता है।