लक्ष्मण स्तुति १ - विनय पत्रिका ३७ - तुलसीदास

लक्ष्मण स्तुति - विनयपत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ३७
लक्ष्मण स्तुति १
दण्डक
लाल लाडिले लखन, हित हौ जनके।
सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी,
पालक कृपालु अपने पनके ॥ १ ॥
धरनी-धरनहार भंजन-भुवनभार,
अवतार साहसी सहसफनके॥
सत्यसंध, सत्यब्रत, परम धरमरत ,
निरमल करम बचन अरु मन के ॥ २ ॥
रूपके निधान, धनु-बान पानि,
तून कटि, महाबीर बिदित, जितैया बड़े रनके ॥
सेवक-सुख-दायक, सबल, सब लायक,
गायक जानकीनाथ गुनगनके ॥ ३ ॥
भावते भरत के, सुमित्रा-सीताके दुलारे ,
चातक चतुर राम स्याम घनके ॥
बल्लभ उरमिलाके, सुलभ सनेहबस ,
धनी धन तुलसीसे निरधनके ॥ ४ ॥
भावार्थ :- हे प्यारे लखनलालजी! तुम भक्तोंका हित करनेवाले हो। स्मरण करते ही तुम संकट हर लेते हो। सब प्रकारके सुन्दर कल्याण करनेवाले, अपने प्रणको पालनेवाले और दीनोंपर कृपा करनेवाले हो ॥१॥
पृथ्वीको धारण करनेवाले, संसारका भार दूर करनेवाले, बड़े साहसी और शेषनागके अवतार हो। अपने प्रण और व्रत को सत्य करने वाले, धर्म के परम प्रेमी निर्मल मन, वचन और कर्मवाले हो ॥२॥
तुम सुन्दरताके भण्डार हो, हाथोंमें धनुष-बाण धारण किये और कमरमें तरकस कसे हुए हो, तुम विश्व-विख्यात महान् वीर हो! और बड़े-बड़े संग्राममें विजय प्राप्त करनेवाले हो। तुम सेवकोंको सुख देनेवाले, महाबली, सब प्रकारसे योग्य और जानकीनाथ श्रीरामकी गुणावलीके गानेवाले हो ॥३॥
तुम भरतजीके प्यारे, सुमित्रा और सीताजीके दुलारे तथा रामरुपी श्याम मेघके चतुर चातक, उर्मिलाजीके पति, प्रेमसे सहजहीमें मिलनेवाले और तुलसी-सरीखे रंकको राम-भक्तिरुपी धन देनेमें बड़े भारी धनी हो ॥४॥
ध्यान दो - वास्तव में राम ही लक्ष्मण बने है। वाल्मीकि रामायण में कहा है कि "इसके बाद कमलनयन श्री हरि ने अपने को चार रूपों में प्रकट करके राजा दशरथ को पिता बनाने का निश्चय किया।"