श्रीराम स्तुति १ - विनय पत्रिका ४३ - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४३
श्रीराम स्तुति १
जयति
सच्चिदव्यापकानंद परब्रह्म-पद विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्रह्मादि,सुर,सिद्ध,संकोचवश,विमल गुण-गेह नर-देह-धारी ॥ १॥
जयति
कोशलाधीश कल्याण कोशलसुता, कुशल कैवल्य-फल चारु चारी।
वेद-बोधित करम-धरम-धरनीधेनु, विप्र-सेवक साधु-मोदकारी ॥ २ ॥
जयति ऋषि-मखपाल, शमन-सज्जन-साल, शापवश मुनिवधू-पापहारी।
भंजि भवचाप, दलि दाप भूपावली, सहित भृगुनाथ नतमाथ भारी ॥ ३ ॥
जयति धारमिक-धुर, धीर रघुवीर गुर-मातु-पितु-बंधु-वचनानुसारी।
चित्रकूटाद्रि विन्ध्याद्रि दंडकविपिन, धन्यकृत पुन्यकानन-विहारी ॥ ४ ॥
जयति पाकारिसुत-काक-करतूति-फलदानि खनि गर्त गोपित विराधा।
दिव्य देवी वेश देखि लखि निशिचरी जनु विडंबित करी विश्वबाधा ॥ ५ ॥
जयति खर-त्रिशिर-दूषण चतुर्दश-सहस-सुभट-मारीच-संहारकर्ता।
गृध्र-शबरी-भक्ति-विवश करुणासिंधु, चरित निरुपाधि, त्रिविधार्तिहर्ता ॥ ६ ॥
जयति मद-अंध कुकबंध बधि, बालि बलशालि बधि, करन सुग्रीव राजा।
सुभट मर्कट-भालु-कटक-संघट सजत, नमत पद रावणानुज निवाजा ॥ ७ ॥
जयति पाथोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु, काल-मन अगम लई ललकि लंका।
सकुल, सानुज, सदल दलित दशकंठ रण, लोक-लोकप किये रहित-शंका ॥ ८ ॥
जयति सौमित्रि-सीता-सचिव-सहित चले पुष्पकारुढ निज राजधानी।
दासतुलसी मुदित अवधवासी सकल, राम भे भूप वैदेहि रानी ॥ ९ ॥
भावार्थ :- श्रीरामचन्द्रजी की जय हो। आप सत, चेतन, व्यापक आनन्दस्वरुप परब्रह्म हैं। आप लीला करने के लिये ही अव्यक्त से व्यक्तरुप में प्रकट हुए हैं। जब ब्रह्मा आदि सब देवता और सिद्धगण दानवों के अत्याचार से व्याकुल हो गये, तब उनके संकोच से आपने निर्मल गुणसम्पन्न नर - शरीर धारण किया ॥१॥ आपकी जय हो - आप कल्याणरुप कोशलनरेश दशरथजी और कल्याणस्वरुपिणी महारानी कौशल्या के यहाँ चार भाइयों के रुपमें (सालोक्य, सामीप्य, सारुप्य और सायुज्य) मोक्ष के सुन्दर चार फल उत्पन्न हुए। आपने वेदोक्त यज्ञादि कर्म, धर्म, पृथ्वी, गौ, ब्राह्मण, भक्त और साधुओं को आनन्द दिया ॥२॥
आपकी जय हो - आपने (राक्षसों को मारकर) विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा की, सज्जनों को सतानेवाले दुष्टों का दलन किया, शाप के कारण पाषाणरुप हुई गौतम-पत्नी अहल्या के पापों को हर लिया, शिवजी के धनुषको तोड़कर राजाओं के दलका दर्प चूर्ण किया और बल-वीर्य-विजय के मद से ऊँचा रहने वाला परशुरामजी का मस्तक झुका दिया ॥३॥ आपकी जय हो - आप धर्म के भार को धारण करने में बड़े धीर रघुवंश में असाधारण वीर हैं। आपने गुरु, माता, पिता और भाई के वचन मानकर चित्रकूट, विन्ध्याचल और दण्डक वन को, उन पवित्र वनों में विहार करके, कृतकृत्य कर दिया ॥४॥
श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जिन्होंने इन्द्रके पुत्र काकरुप बने हुए कपटी जयन्तको उसकी करनी का उचित फल दिया, जिन्होंने गड्ढा खोदकर विराध दैत्य को उसमें गाड़ दिया, दिव्य देवकन्याका रुप धरकर आयी हुई राक्षसी शूर्पणखा को पहचानकर उसके नाक-कान कटवाकर मानो संसारभर के सुखमें बाधा पहुँचाने वाले रावणका तिरस्कार किया ॥५॥ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - आप खर, त्रिशिरा, दूषण, उनकी चौदह हजार सेना और मारीच को मारने वाले हैं, मांसभोजी गृध्र जटायु और नीच जाति की स्त्री शबरीके प्रेम के वश हो उनका उद्धार करनेवाले, करुणा के समुद्र, निष्कलंक चरित्र वाले और त्रिविध तापों का हरण करने वाले हैं ॥६॥
श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जिन्होंने दुष्ट, मदान्ध कबन्ध का वध किया, महाबलवान् बालि को मारकर सुग्रीव को राजा बनाया, बड़े-बड़े वीर बंदर तथा रीछों की सेना को एकत्र करके उनको व्यूहाकार सजाया और शरणागत विभीषण को मुक्ति और भक्ति देकर निहाल कर दिया ॥७॥ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जिन्होंने खेल के लिये ही समुद्रपर पुल बाँध लिया, काल के मन को भी अगम लंका को उमंग से ही लपक लिया और कुलसहित, भाईसहित और सारी सेनासहित रावण का रण में नाश करके तीनों लोकों और इन्द्र, कुबेरादि लोकपालों को निर्भय कर दिया ॥८॥
श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जो लंका - विजयकर लक्ष्मणजी, जानकीजी और सुग्रीव, हनुमानादि मन्त्रियोंसहित पुष्पक विमानपर चढ़कर अपनी राजधानी अयोध्याको चले। तुलसीदास गाता है कि वहाँ पहुँचकर श्रीराम के महाराजा और श्रीसीताजी के महारानी होने पर समस्त अवधवासी परम प्रसन्न हो गये ॥९॥