श्रीराम स्तुति २ - विनय पत्रिका ४४ - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४४
श्रीराम स्तुति २
जयति
राज-राजेंद्र राजीवलोचन, राम
  नाम कलि-कामतरु, साम-शाली।
अनय-अंभोधि-कुंभज, निशाचर-निकर-
  तिमिर-घनघोर-खरकिरणमाली ॥ १ ॥
जयति मुनि-देव-नरदेव दसरत्थके,
  देव-मुनि-वंद्य किय अवध-वासी।
लोक नायक-कोक-शोक-संकट-शमन,
  भानुकुल-कमल कानन-विकासी ॥ २ ॥
जयति शृंगार-सर तामरस-दामदुति-
  देह, गुणगेह, विश्वोपकारी।
सकल सौभाग्य-सौंदर्य-सुषमारुप,
  मनोभव कोटि गर्वापहारी ॥ ३ ॥
(जयति) सुभग सारंग सुनिखंग सायक शक्ति,
  चारु चर्मासि वर वर्मधारी।
धर्मधुरधीर, रघुवीर, भुजबल अतुल,
  हेलया दलित भूभार भारी ॥ ४ ॥
जयति कलधौत मणि-मुकुट, कुंडल, तिलक-
  झलक भलि भाल, विधु-वदन-शोभा।
दिव्य भूषन, बसन पीत, उपवीत,
  किय ध्यान कल्यान-भाजन न को भा ॥ ५ ॥
(जयति)भरत-सौमित्रि-शत्रुघ्न-सेवित, सुमुख,
  सचिव-सेवक-सुखद, सर्वदाता।
अधम, आरत, दीन, पतित, पातक-पीन
  सकृत नतमात्र कहि 'पाहि' पाता ॥ ६ ॥
जयति जय भुवन दसचारि जस जगमगत,
  पुन्यमय, धन्य जय रामराजा।
चरित-सुरसरित कवि-मुख्य गिरि निःसरित,
पिबत, मज्जत मुदित सँत-समाजा ॥ ७ ॥
जयति वर्णाश्रमाचारपर नारि-नर,
  सत्य-शम-दम-दया-दानशीला।
विगत दुख-दोष, संतोस सुख सर्वदा,
  सुनत, गावत राम राजलीला ॥ ८ ॥
जयति वैराग्य-विज्ञान-वारांनिधे
  नमत नर्मद, पाप-ताप-हर्ता।
दास तुलसी चरण शरण संशय-हरण,
  देहि अवलंब वैदेहि-भर्ता ॥ ९ ॥
भावार्थ :- श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जो राज राजेश्वरों में इन्द्रके समान हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, जिनका नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान हैं, जो (शरणागत भक्तोंको) सान्त्वना देनेवाले (ढाढस बँधानेवाले) हैं, अनीतिरुपी समुद्र को सोखने के लिये जो अगस्त्य ऋषि के समान और दानव दलरुपी गाढ़् और भयानक अन्धकारका नाश करने के लिये जो प्रचण्ड सूर्यके समान हैं ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो-मुनि, देवता और मनुष्यों के स्वामी जिन दशरथसुनु श्रीरामचन्द्रजी ने अवधवासियों को ऐसा श्रेष्ठ बना दिया कि मुनि और देवता भी उनकी वन्दना करने लगे। जो लोकपालरुपी चकवों के शोक सन्तापका नाश करने वाले और सूर्यकुलरुपी कमलों के वनको प्रफुल्लित करने वाले साक्षात् सूर्य हैं ॥२॥
श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - सौन्दर्यरुपी सरोवर में उत्पन्न हुए नीले कमलों की माला के समान जिनके शरीर की आभा है, जो सम्पूर्ण दिव्य गुणों के धाम हैं, सारे विश्व का हित करने वाले हैं और समस्त सौभाग्य, सौन्दर्य तथा परम शोभायुक्त अपने रुपसे करोड़ों कामदेवों के गर्व को खर्व करने वाले हैं ॥३॥ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जो सुन्दर शार्ङ्ग धनुष, तरकस, बाण, शक्ति, ढाल, तलवार और श्रेष्ठ कवच धारण किये हैं, धर्मका भार उठाने में जो धीर हैं, और जिन्होंने खेल से ही राक्षसोंका नाश करके पृथ्वीका भारी भार हरण का लिया ॥४॥
श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जो मणि-जड़ित सुवर्ण का मुकुट मस्तकपर धारण किये और कानों मे मकरावृत्त कुण्डल पहने हैं; जिनके भाल पर तिलक की सुन्दर झलक है और चन्द्रमाके समान जिनका मुखमण्डल शोभित हो रहा हैं; जो पीताम्बर, दिव्य आभूषण और यज्ञोपवीत धारण किये हुए हैं। ऐसा कौन है जो श्रीरामके इस नयनाभिरास रुपका ध्यान करके कल्याणका भागी न हुआ हो ॥५॥ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जो भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से सेवित तथा सुग्रीव, सुमन्त आदि मन्त्रियों और भक्तों को सुख एवं सम्पूर्ण इच्छित पदार्थ देने वाले हैं; जो अधम, आर्त, दीन, पतित और महापापियों को केवल एक बार प्रणाम करने और 'मेरी रक्षा करो' इतना कहने पर ही जन्म-मरणरुप संसारसे बचा लेते हैं ॥६॥
महाराज श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जिनका पवित्र यश चौदहों भुवनों में जगमगा रहा हैं, जो सर्वथा पुण्यमय और धन्य हैं, जिनकी कथारुपी गंगा आदिकवि महर्षि श्रीवाल्मीकिरुपी हिमालय-पर्वत से निकली है, जिसमें स्नान कर और जिसके जलका पान कर अर्थात् जिसका श्रवण-मनन कर संत-समाज सदा प्रसन्न रहता है ॥७॥ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जिनके प्रसिद्ध रामराज्यमें सभी स्त्री-पुरुष अपने-अपने वर्णाश्रम-विहित आचारपर चलने वाले; सत्य, शम, दम, दया और दानरुपी व्रतों का पालन करने वाले; दुःखों और दोषों से रहित, सदा सन्तोषी, सब प्रकार से सुखी और राम की राज्यलीलाको सदा गया और सुना करते थे अर्थात् वे निश्चिन्त होकर सदा रामकी लीला को ही गाते-सुनते थे ॥८॥
श्रीरामचन्द्रजी की जय हो - जो वैराग्य और ज्ञानविज्ञान के समुद्र हैं, जो प्रणाम करने वालों को सुख देते और उनके सारे पापतापों को हर लेते हैं। हे जानकीनाथ! हे संशयका नाश करनेवाले! यह तुलसीदास आपकी शरण पड़ा है, कृपाकर इसे अपने प्रणतपाल चरणों का सहारा दीजिये ॥९॥
ध्यान दो - तुलसीदासजी ने कहा "जो 'मेरी रक्षा करो' इतना कहने पर ही जन्म-मरणरुप संसार से श्रीराम बचा लेते हैं।" आपलोग प्रायः यह सोच रहे होंगे 'मेरी रक्षा करो' यह तो हर व्यक्ति ने कहा है। परन्तु कहा श्रीराम लोगों को जन्म-मरणरुप संसारसे बचा लेते हैं? मैंने स्वयं बोल कर देखा है, ऐसा कुछ नहीं हुआ।
हाँ, आपका अनुभव सत्य है। लेकिन तुलसीदासजी ने एक शर्त रखी है ऐसा ('मेरी रक्षा करो') कहने पर। तुलसीदासजी कहते है "जो अधम, आर्त, दीन, पतित और महापापि ऐसा १००% मान लेता है और 'मेरी रक्षा करो' यह कहता है। उसको जन्म-मरणरुप संसार से श्री राम बचा लेते हैं।"