श्रीराम स्तुति ३ - विनय पत्रिका ४५ - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४५
श्रीराम स्तुति ३
राग गौरी
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं ॥ १ ॥
कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनिल नीरद सुंदरं।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥ २ ॥
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश निकंदनं।
रघुनंद आनँदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं ॥ ३ ॥
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं।
आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं ॥ ४ ॥
इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम ह्रदय कंज निवास करु कामादि खल-दल-गंजनं ॥ ५ ॥
भावार्थ :- हे मन! कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर। वे संसार के जन्म-मरणरुप दारुण भय को दूर करने वाले हैं, उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान हैं; मुख, हाथ और चरण भी लाल कमल के सदृश हैं ॥१॥
उनके सौन्दर्य की छटा अगणित कामदेवों से बढ़कर है, उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है, पीताम्बर मेघरुप शरीर में मानो बिजली के समान चमक रहा है, ऐसे पावनरुप जानकीपति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥
हे मन! दीनों के बन्धु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंशका समूल नाश करने वाले, आनन्दकन्द, कोशलदेशरुपी आकाश में निर्मल चन्द्रमा के समान, दशरथनन्दन श्रीराम का भजन कर ॥३॥
जिनके मस्तकपर रत्नजटित मुकुट, कानों में कुण्डल, भालपर सुन्दर तिलक और प्रत्येक अंग में सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं; जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं; जो धनुष-बाण लिये हुए हैं; जिन्होंने संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है ॥४॥
जो शिव, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम-क्रोध-लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। तुलसीदास प्रार्थना करता है कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे हदय-कमल में सदा निवास करें ॥५॥