श्रीसीता स्तुति २ - विनय पत्रिका ४२ - तुलसीदास

सीता स्तुति - विनय पत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४२
श्रीसीता स्तुति २
कबहुँ समय सुधि द्ययाबी,मेरी मातु जानकी।
जन कहाइ नाम लेत हौं, किये पन चातक ज्यों,प्यास-प्रेम-पानकी ॥ १ ॥
सरल कहाई प्रकृति आपु जानिए करुना-निधानकी।
निजगुन, अरिकृत अनहितौ,दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी ॥ २ ॥
बानि बिसारनसील है मानद अमानकी।
तुलसीदास न बिसारिये, मन करम बचन जाके,सपनेहुँ गति न आनकी ॥ ३ ॥
भावार्थ :- हे जानकी माता! कभी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीं का दास कहाता हूँ, उन्हीं का नाम लेता हूँ, उन्हीं के लिये पपीहे की तरह प्रण किये बैठा हूँ, मुझे उनके स्वाती-जलरुपी प्रेमरस की बड़ी प्यास लग रही है ॥१॥ यह तो आप जानती ही हैं कि करुणा-निधान रामजी का स्वभाव बड़ा सरल हैं; उन्हें अपना गुण, शत्रुद्वारा किया हुआ अनिष्ट, दास का अपराध और दिये हुए दान की बात कभी याद ही नहीं रहती ॥२॥
उनकी आदत भूल जाने की है; जिसका कहीं मान नहीं होता, उसको वह मान दिया करते हैं; पर वह भी भूल जाते हैं! हे माता! तुम उनसे कहना कि तुलसीदास को न भूलिये, क्योंकि उसे मन, वचन और कर्म से स्वप्न में भी किसी दूसरे का आश्रय नहीं है ॥३॥
ध्यान दो - जब भक्त भगवान से प्रेम करता है तो अनेक भाव में वो रहता है। कभी-कभी इतना प्रेम और उनके प्रति आश्रय हो जाता है की वो उनसे अपने को न भूलने की बात करता है। वो इतना आश्रय हो जाता है की यह सोच के भयभीत होता है कि मेरा उनके सिवा कोई और नहीं है, अगर वो मुझे भूल गए तो मेरा क्या होगा? इत्यादि। यद्यपि भगवान किसी को भूलते नहीं है।
कुछ हद तक यह संसारी प्रेम में भी देखा जा सकता है कि प्रेमी अपने प्रेमिका को नहीं भूलने को कहता है।