श्रीसीता स्तुति १ - विनय पत्रिका ४१ - तुलसीदास

सीता स्तुति १ - विनय पत्रिका ४१ - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४१
श्रीसीता स्तुति १
राग केदारा
कबहुँक अंब, अवसर पाइ।
मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥ १ ॥
दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥ २ ॥
बूझिहैं 'सो है कोन', कहिबी नाम दसा जनाइ।
सुनत राम कृपालुके मेरी बिगरीऔ बनि जाइ ॥ ३ ॥
जानकी जगजननि जनकी किये बचन सहाइ।
तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ॥ ४ ॥
भावार्थ :- हे माता! कभी अवसर हो तो कुछ करुणा की बात छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी भी याद दिला देना, (इसी से मेरा काम न जायगा) ॥१॥ यों कहना कि एक अत्यन्त दीन, सर्व साधनों से हीन, मनमलीन, दुर्बल और पूरा पापी मनुष्य आप की दासी (तुलसी) - का दास कहलाकर और आपका नाम ले-लेकर पेट भरता है ॥२॥
इस पर प्रभु कृपा करके पूछें कि वह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें बता देना। कृपालु रामचन्द्रजी के इतना सुन लेने से ही मेरी सारी बिगड़ी बात बन जायगी ॥३॥ हे जगज्जननी जानकीजी! यदि इस दास की आपने इस प्रकार वचनों से ही सहायता कर दी तो यह तुलसीदास आपके स्वामी की गुणावली गाकर भवसागर से तर जायगा ॥४॥
ध्यान दो - अत्यन्त दीन, सर्व साधनों से हीन, मनमलीन, दुर्बल और पूरा पापी (जो की वास्तविकता है क्योंकि हमने अनंत जन्मों में अनंत पाप किया है, झूठ बोलना भी पाप ही तो है।) जब मनुष्य अपने आपको ऐसा १००% मान लेता है। तब कृपालु भगवान् मनुष्य को ऐसा मानता देख कृपा करके उसपर से अपनी माया को हटा देते है अर्थात् माया से मुक्त कर देते है। तब वो भवसागर से तर जाता है। शायद इसीलिए तुलसीदास माँ सीता से प्रार्थना कर रहे है।