हरिशंकरी पद - विनय पत्रिका ४९ - तुलसीदास

हरिशंकरी पद - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४९
हरिशंकरी पद
देव-
दनुज-बन-दहन, गुन-गहन, गोविंद नंदादि-आनंद-दाताऽविनाशी।
शंभु, शिव, रुद्र, शंकर, भयंकर, भीम, घोर, तेजायतन, क्रोध-राशी ॥ १ ॥
अनँत, भगवंत-जगदंत-अंतक-त्रास-शमन, श्रीरमन, भुवनाभिरामं।
भूधराधीश जगदीश ईशान, विज्ञानघन, ज्ञान-कल्यान-धामं ॥ २ ॥
वामनाव्यक्त, पावन, परावर, विभो, प्रकट परमातमा, प्रकृति-स्वामी।
चंद्रशेखर, शूलपाणि, हर, अनघ, अज, अमित, अविछिन्न, वृशभेश-गामी ॥ ३ ॥
नीलजलदाभ तनु श्याम, बहु काम छवि राम राजीवलोचन कृपाला।
कबुं-कर्पूर-वपु धवल, निर्मल मौलि जटा, सुर-तटिनि, सित सुमन माला ॥ ४ ॥
वसन किंजल्कधर, चक्र-सारंग-दर-कंज-कौमोदकी अति विशाला।
मार-करि-मत्त-मृगराज, त्रैनैन, हर, नौमि अपहरण संसार-जाला ॥ ५ ॥
कृष्ण, करुणाभवन, दवन कालीय खल, विपुल कंसादि निर्वशकारी।
त्रिपुर-मद-भंगकर, मत्तगज-चर्मधर, अन्धकोरग-ग्रसन पन्नगारी ॥ ६ ॥
ब्रह्म, व्यापक, अकल, सकल, पर, परमहित, ग्यान, गोतीत, गुण-वृत्ति-हर्त्ता।
सिंधुसुत-गर्व-गिरि-वज्र, गौरीश, भव दक्ष-मख अखिल विध्वंसकर्त्ता ॥ ७ ॥
भक्तिप्रिय, भक्तजन-कामधुक धेनु, हरि हरण दुर्घट विकट विपति भारी।
सुखद, नर्मद, वरद, विरज, अनवघ्यऽखिल, विपिन-आनंद-वीथिन-विहारी ॥ ८ ॥
रुचिर हरिशंकरी नाम-मंत्रावली द्वंद्वदुख हरनि, आनंदखानी।
विष्णु-शिव-लोक-सोपान-सम सर्वदा वदति तुलसीदास विशद बानी ॥ ९ ॥
ध्यान दो - इस भजनके प्रत्येक पदमें आधेमें भगवान्् श्रीविष्णुकी और आधेमें भगवान्् शिवकी स्तुति की गयी है, इसीसे इसका नाम हरि-शंकरी हैं। गोसाईंजी महाराजने विष्णु और शिवकी एक साथ स्तुति करके हरिहरमें अभेद सिद्ध किया है।
भावार्थ :- भगवान् विष्णु - दानवरुपी वनके जलानेवाले, गुणोंके वन अर्थात् सात्त्विक सदगुणोंसे सम्पन्न, इन्द्रियोंके नियन्ता, नन्द-उपनन्द आदिको आनन्द देनेवाले और अविनाशी हैं। भगवान् शिव - शम्भु, शिव, रुद्र, शंकर आदि कल्याणकारी नामोंसे प्रसिद्ध हैं; बड़े भारी भयंकर, महान तेजस्वी और क्रोधकी राशि हैं ॥१॥
भगवान् विष्णु - अनन्त हैं, छः प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त हैं, जतका अन्त करनेवाले, यमकी त्रासको मिटानेवाले, लक्ष्मीजीके स्वामी और समस्त ब्रह्माण्डको आनन्द देनेवाले हैं। भगवान् शिव - कैलासके राजा, जगतके स्वामी, ईशान, विज्ञानघन और ज्ञान तथा मोक्षके धाम हैं ॥२॥
भगवान् विष्णु - वामनरुप धरनेवाले, मन-इन्द्रियोंसे अव्यक्त, पवित्र (विकाररहित), जड़-चेतन और लोक-परलोकके स्वामी, साक्षात् परमात्मा और प्रकृतिके स्वामी हैं। भगवान् शिव-मस्तकपर चन्द्रमा और हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले, सृष्टिके संहारकर्त्ता, पापशून्य, अजन्मा, अमेय, अखण्ड और नन्दीपर सवार होकर चलनेवाले हैं ॥३॥
भगवान् विष्णु - नीले मेघके समान श्याम शरीरवाले, अनेक कामदेवोंकीसी शोभावाले, कमलके सदृश सुन्दर नेत्रवाले और समस्त विश्वमें रमनेवाले कृपालु हैं। भगवान् शिव - शंख और कपूरके समान चिकने, श्वेत और सुगन्धित शरीरवाले, मलरहित, मस्तकपर जटाजूट और गंगाजीको धारण करनेवाले तथा सफेद पुष्पोंकी माला पहने हुए हैं ॥४॥
भगवान् विष्णु - कमलके केसरके समान पीताम्बर धारण किये तथा हाथोंमें शंख, चक्र, पद्म, शार्ङ्ग धनुष और अत्यन्त विशाल कौमोदकी गदा लिये हुए हैं। भगवान् शिव - कामदेवरुपी मतवाले हाथीको मारनेके लिये सिंहरुप, तीन नेत्रवाले और आवागमनरुपी जगतके जालका नाश करनेवाले हैं; ऐसे शिवजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥५॥
भगवान् विष्णु - सबका आकर्षण करनेवाले, करुणाके धाम, कालिय नागके दमन करनेवाले और कंस आदि अनेक दुष्टोंको निर्वंश करनेवाले हैं। भगवान् शिव - त्रिपुरासुरका मद चूर्ण करनेवाले, मतवाले हाथीका चर्म धारण करनेवाले और अन्धकासुररुपी सर्पको ग्रसनेके लिये गरुड़ हैं ॥६॥
भगवान् विष्णु - पूर्णब्रह्म, चराचरमें व्यापक, कलारहित, सबसे श्रेष्ठ, परम हितैषी, ज्ञानस्वरुप, अन्तः करणरुपी भीतरी और श्रवणादि बाहरी इन्द्रियोंसे अतीत और तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका हरण करनेवाले हैं। भगवान् शिव - जलन्धरके गर्वरुपी पर्वतको तोड़नेके लिये वज्ररुप, पार्वतीके पति, संसारके उत्पत्तिस्थान हैं और दक्षके सम्पूर्ण यज्ञके विध्वंस करनेवाले हैं ॥७॥
भगवान् विष्णु - जिनको भक्ति ही प्यारी है, जो भक्तोंके मनोरथ पूर्ण करनेके लिये कामधेनुके समान हैं और उनकी बड़ी-बड़ी कठिन तथा भयानक विपत्तियोंके हरनेवाले, अतएव हरि कहलानेवाले हैं। भगवान् शिव - सुख, आनन्द और मनचाहा वर देनेवाले, विरक्त, सभ प्रकारके विकारों एवं दोषोंसे रहित और आनन्दवन काशीकी गलियोंमें विहार करनेवाले हैं ॥८॥
यह हरि और शंकरके नाम-मन्त्रोंकी सुन्दर पंक्तियाँ राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे जनित दुःखको हरनेवाली, आनन्दकी खानि और विष्णु तथा शिवलोकमें जानेके लिये सदा सीढ़ीके समान हैं, यह बात तुलसीदास शुध वाणीसे कहता हैं ॥९॥