श्री राम आरती १ - विनय पत्रिका ४७ - तुलसीदास

श्रीराम आरती १ - विनय पत्रिका - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४७
श्री राम आरती १
ऐसी आरती राम रघुबीरकी करहि मन।
हरन दुखदुंद गोबिंद आनन्दघन ॥ १ ॥
अचरचर रूप हरि, सरबगत, सरबदा बसत, इति बासना धूप दीजै।
दीप निजबोधगत-कोह-मद-मोह-तम,प्रौढऽभिमान चितबृति छीजै ॥ २ ॥
भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभ श्रीरमण परम संतोषकारी।
प्रेम-तांबूल गत शूल संशय सकल, विपुल भव-बासना-बीजहारी ॥ ३ ॥
अशुभ-शुभकर्म-घृतपूर्ण दश वर्तिका, त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं।
भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जगनिवासं ॥ ४ ॥
बिमल ह्रदि-भवन कृत शांति-पर्यक शुभ, शयन विश्राम श्रीरामराया।
क्षमा-करुणा प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया ॥५ ॥
एहि
आरती-निरत सनकादि, श्रुति, शेष, शिव, देवरिषि, अखिलमुनि तत्व-दरसी
करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमलमति-दास तुलसी ॥ ६ ॥
भावार्थ :- हे मन! रघुकुल-वीर श्रीरामचन्द्रजी की इस प्रकार आरती कर। वे राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों तथा दुःखो के नाशक, इन्द्रियों का नियन्त्रण करने वाले और आनन्द की वर्षा करने वाले हैं ॥१॥
जड़-चेतन जगत सब श्रीहरि का रुप है, वे सर्वव्यापी और नित्य हैं - इस वासना ( सुगन्ध ) - की उनकी धूप कर। इससे तेरी भेदरुप दुर्गन्ध मिट जायगी। धूप के बाद दीप दिखाना चाहिये, सो आत्मज्ञान का स्वयं प्रकाशमय दीपक जलाकर उससे क्रोध, मद, मोह के अन्धकार का नाश कर दे। इस ज्ञान-प्रकाश से अभिमानभरी चित्त-वृत्तियाँ आप ही क्षीण हो जायँगी ॥२॥ इसके बाद अत्यन्त निर्मल श्रेष्ठभाव का नैवेद्य भगवान् के अर्पण कर, विशुद्ध भाव का सुन्दर नैवेद्य लक्ष्मीपति भगवान् को परम सन्तोषकारी होगा। फिर दुःख, समस्त सन्देह और अपार संसार की वासनाओं के बीजके नाश करने वाले 'प्रेम' का ताम्बूल भगवान् के निवेदन कर ॥३॥
तदनन्तर शुभाशुभ कर्मरुपी घृत में डूबी हुई दस इन्द्रियरुपी वृत्तियों को त्याग की अग्नि से जलाकर सत्त्वगुणरुपी प्रकाश कर; इस तरह भक्ति, वैराग्य और विज्ञानरुपी दिपावली की आरती जगन्निवास भगवान् के अर्पण कर ॥४॥
आरती के बाद निर्मल हदयरुपी मन्दिर में शान्तिरुपी सुन्दर पलंग बिछाकर उसपर महाराज श्रीरामचन्द्रजी को शयन करवाकर विश्राम करा। वहाँ महाराजकी सेवा के लिये क्षमा, करुणा आदि मुख्य दासियों को नियुक्त कर। जहाँ भगवान् हरि रहते हैं, वहाँ भेदरुप माया नहीं रहती ॥५॥
सनकादि, वेद, शुकदेवजी, शेष, शिवजी, नारदजी और सभी तत्त्वदर्शी मुनि ऐसी आरतीमें सदा लगे रहते हैं; निर्मलमति मुनियों का दास तुलसी कहता है कि जो कोई ऐसी आरती करता है वह कामादि विकारों से छूटकर इस भवसागर से तर जाता है ॥६॥
ध्यान दो - तुलसीदासजी मन को आरती करने को कह रहे है अर्थात् मन से राम-नाम जप हो या आरती हो, जो कुछ करना है वो मन को करना है। अतएव मन से आरती करते वक्त राम को सर्व समर्थ, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों तथा दुःखो के नाशक, इन्द्रियों का नियन्त्रण करने वाले और आनन्द की वर्षा करने वाले है, ऐसा विश्वाश करो। फिर जैसे तुलसीदासजी ने आरती बताई है वैसा करो। आरती के बाद निर्मल हदयरुपी मन्दिर में शान्तिरुपी सुन्दर पलंग बिछाकर उसपर महाराज श्रीरामचन्द्रजी को शयन करवाकर विश्राम कराकर वहाँ महाराजकी सेवा के लिये तुम्हारे अंदर जो क्षमा, करुणा आदि दासी है उनको नियुक्त करो। ऐसा इसलिए करना है क्योंकि जब तक भगवान् हरि (राम) मन में रहते हैं, वहाँ भेदरुप माया नहीं रहती। सनकादि, वेद, शुकदेवजी, शेष, शिवजी, नारदजी और सभी तत्त्वदर्शी मुनि ऐसी आरती में सदा लगे रहते हैं। ऐसी आरती करने से व्यक्ति कामादि विकारों से छूटकर इस भवसागर से तर जाता है।