श्री राम आरती २ - विनय पत्रिका ४८ - तुलसीदास

श्रीराम आरती - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४८
श्री राम आरती २
हरति सब आरती आरती रामकी।
दहन दुख-दोष, निरमूलिनी कामकी ॥ १ ॥
सुरभ सौरभ धूप दीपबर मालिका।
उड़त अघ-बिहँग सुनि ताल करतालिका ॥ २ ॥
भक्त-ह्रदि-भवन, अज्ञान-तम-हारिनी।
बिमल बिग्यानमय तेज-बिस्तारिनी ॥ ३ ॥
मोह-मद-कोह-कलि-कंज-हिमजामिनी।
मुक्तिकी दूतिका, देह-दुति दामिनी ॥ ४ ॥
प्रनत-जन-कुमुद-बन-इंदु-कर-जालिका।
तुलसि अभिमान-महिषेस बहु कालिका ॥ ५ ॥
भावार्थ :- श्रीरामचन्द्रजी की आरती सब आर्त्ति-पीड़ा को हर लेती हैं। दुःख और पापों को जला देती है तथा कामना को जड़से उखाड़्कर फेंक देती है ॥१॥
वह सुन्दर सुगन्धयुक्त धूप और श्रेष्ठ दीपकों की माला है। आरती के समय हाथों से बजायी जानेवाली ताली का शब्द सुनकर पापरुपी पक्षी तुरंत उड़ जाते हैं ॥२॥
यह आरती भक्तों के हदयरुपी भवन के अज्ञानरुपी अन्धकार का नाश करने वाली और निर्मल विज्ञानमय प्रकाश को फैलाने वाली है ॥३॥
यह मोह, मद, क्रोध और कलियुगरुपी कमलों के नाश करने के लिये जाड़े की रात है और मुक्तिरुपी नायिका से मिला देनेके लिये दूती है तथा इसके शरीर की चमक बिजली के समान है ॥४॥
यह शरणागत भक्तरुपी कुमुदिनी के वन को प्रफुल्लित करने के लिये चन्द्रमा के किरणों की माला है और तुलसीदास के अभिमानरुपी महिषासुर का मर्दन करने के लिये अनेक कालिकाओं के समान हैं ॥५॥
ध्यान दो - आरती कैसे करनी है तथा आरती के बाद क्या करना है? यह तुलसीदास जी ने अपने विनयपत्रिका ४७ में विस्तार से बताया है। अब विनय पत्रिका ४८ में बता रहे है की राम जी की आरती करने से लाभ क्या होगा। तुलसीदास जी कह रहे है कि मन द्वारा श्रीरामचन्द्रजी की आरती कोई निरंतर करता है तब वो सब आर्त्ति-पीड़ा को हर लेती हैं। उनकी आरती दुःख और पापों को जला देती है तथा कामना को जड़से उखाड़्कर फेंक देती है अर्थात् माया चली जाती है।