श्रीराम नाम वन्दना - विनय पत्रिका ४६ - तुलसीदास

श्री राम नाम वन्दना - तुलसीदास
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ४६
श्रीराम नाम वन्दना
राग रामकली
सदा
राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढंअन बार बारं।
सकल सौभाग्य-सुख-खानि जिय जानि शठ, मानि विश्वास वद वेदसारं ॥ १ ॥
कोशलेन्द्र नव-नीलकंजाभतनु, मदन-रिपु-कंजह्रदि-चंचरीकं।
जानकीरवन सुखभवन भुवनैकप्रभु, समर-भंजन, परम कारुनीकं ॥ २ ॥
दनुज-वन धूमधुज, पीन आजानुभुज, दंड-कोदंडवर चंड बानं।
अरुनकर चरण मुख नयन राजीव, गुन-अयन, बहु मयन-शोभा-निधानं ॥ ३ ॥
वासनावृंद-कैरव-दिवाकर, काम-क्रोध-मद कंज-कानन-तुषारं।
लोभ अति मत्त नागेंद्र पंचानन भक्तहित हरण संसार-भारं ॥ ४ ॥
केशवं, क्लेशहं, केश-वंदित पद-द्वंद्व मंदाकिनी-मूलभूतं।
सर्वदानंद-संदोह, मोहापहं, घोर-संसार-पाथोधि-पोतं ॥ ५ ॥
शोक-संदेह-पाथोदपटलानिलं, पाप-पर्वत-कठिन-कुलिशरूपं।
संतजन-कामधुक-धेनु, विश्रामप्रद, नाम कलि-कलुष-भंजन अनूपं ॥ ६ ॥
धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पथि संबलं, मूलमिदमेव एकं।
भक्ति-वैराग्यं विज्ञान-शम-दान-दम, नाम आधीन साधन अनेकं ॥ ७ ॥
तेन तप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं, तेन सर्व कृतं कर्मजालं।
येन श्रीरामनामामृतं पानकृतमनिशमनवद्यमवलोक्य कालं ॥ ८ ॥
श्वपच, खल, भिल्ल,यवनादि हरिलोकगत, नामबल विपुल मति मल न परसी।
त्यागि सब आस, संत्रास, भवपास असि निसित हरिनाम जपु दासतुलसी ॥ ९ ॥
भावार्थ :- रे मूर्ख मन! सदा-सर्वदा बार-बार श्रीराम नाम का ही जप कर; यह सम्पूर्ण सौभाग्य-सुख की खानि है और यही वेद का निचोड़ है, ऐसा जीमें समझकर और पूर्ण विश्वास करके सदा श्रीराम नाम कहा कर ॥१॥ कोशलराज श्रीरामचन्द्रजी के शरीर की कान्ति नवीन नील कमलके समान हैं; वे कामदेव को भस्म करने वाले शिवजी के हदयरुपी कमल में रमने वाले भ्रमर हैं। वे जानकी-रमण, सुखधाम, अखिल विश्व के एकमात्र प्रभु, समर में दुष्टों का नाश करने वाले और परम दयालु हैं ॥२॥
वे दानवों के वनके लिये अग्निके समान हैं। पुष्ट और घुटनों तक लंबे भुजदण्डों में सुन्दर धनुष और प्रचण्ड बाण धारण किये हैं। उनके हाथ, चरण, मुख और नेत्र लाल कमल के समान कमनीय हैं। वे सदगुणों के स्थान और अनेक कामदेवों की सुन्दरता के भण्डार हैं ॥३॥ विविध वासनारुपी कुमुदिनीका नाश करनेके लिये साक्षात् सूर्य और काम, क्रोध, मद आदि कमलों के वनको नष्ट करने के लिये तुषार (पाला) हैं; लोभरुपी अत्यन्त मतवाले गजराजके लिये वनराज सिंह और भक्तोंकी भलाईके लिये राक्षसोंको मारकर संसारका भार उतारनेवाले हैं ॥४॥
जिनका नाम केशव हैं, जो क्लेशों के नाश करने वाले हैं, ब्रह्मा और शिव से जिनके चरणयुगल वन्दित होते हैं - जो गंगाजी के उत्पत्तिस्थान हैं। सदा आनन्द के समूह, मोह के विनाशक और भयानक भव-सागर के पार जाने के लिये जहाज हैं ॥५॥ श्रीरामजी शोक और संशयरुपी मेघों के समूह को छिन्न-भिन्न करने के लिये वायुरुप और पापरुपी कठिन पर्वत को तोड़ने के लिये वज्ररुप हैं। जिनका अनुपम नाम संतों को कामधेनुके समान इच्छित फल देने वाला तथा शान्तिदायक और कलियुगके भारी पापों को नाश करने में सानी नहीं रखता ॥६॥
यह श्रीरामनाम धर्मरुपी कल्पवृक्ष का बगीचा, भगवान के धाम में जाने वाले पथिकोंके लिये पाथेय तथा समस्त साधन और सिद्धियों का मूल आधार हैं। भक्ति, वैराग्य, विज्ञान, शम, दम, दान आदि मोक्ष के अनेक साधन-सभी इस रामनाम के अधीन हैं ॥७॥ जिसने इस कराल कलिकाल को देखकर नित्य-निरन्तर श्रीरामनारुपी निर्दोष अमृत का पान किया - उसने सारे तप कर लिये, सब यज्ञों का अनुष्ठन कर लिया, सर्वस्व दान दे दिया और विधि के अनुसार सभी वैदिक कर्म कर लिये ॥८॥
अनेक चाण्डाल, दुष्कर्मी, भील और यवनादि केवल रामनाम के प्रचण्ड प्रताप से श्रीहरि के परमधाम में पहुँच गये और उनकी बुद्धि को विकारों ने स्पर्श भी नहीं किया। हे तुलसीदास! सारी आशा और भय को छोड़कर संसाररुपी बन्धन को काटने के लिये पैनी तलवार के समान श्रीराम-नाम का सदा जप कर ॥९॥
ध्यान दो - यहाँ पर तुलसीदास जी वेदों शास्त्रों के सार को बताते हुए कहते है कि सिद्धि, वैराग्य, विज्ञान, शम, दम, दान आदि मोक्ष भक्ति के अधीन है। इसलिए हे मूर्ख मन! तू अनादि काल से संसार में सुख मान कर संसार की उपासना कर रहा है। अतएव भक्ति को सर्वश्रेष्ठ साधन समझ कर, जिसके चाण्डाल, दुष्कर्मी, भील और यवनादि तक अधिकारी है, इसलिए उस भक्ति मार्ग को अपना और सारी आशा और भय को छोड़कर संसाररुपी बन्धन को काटने के लिये पैनी तलवार के समान श्रीराम-नाम का सदा जप कर।