श्रीराम स्तुति ४ - विनय पत्रिका ५० - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ५०
श्रीराम स्तुति ४
देव-
भानुकुल-कमल-रवि, कोटि कंर्दप-छवि, काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं।
प्रबल भुजदंड परचंड-कोदंड-धर तूणवर विशिख बलमप्रमेयं ॥ १ ॥
अरुण राजीवदल-नयन, सुषमा-अयन, श्याम तन-कांति वर वारिदाभं।
तत्प कांचन-वस्त्र, शस्त्र-विद्या-निपुण, सिद्ध-सुर-सेव्य, पाथोजनाभं ॥ २ ॥
अखिल लावण्य-गृह, विश्व-विग्रह, परम प्रौढ, गुणगूढ़, महिमा उदारं।
दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, स्वर्ग-अपवर्ग-पति, भग्न संसार-पादप कुठारं ॥ ३ ॥
शापवश मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित, यज्ञ-रक्षण-दक्ष, पक्षकर्ता।
जनक-नृप-सदसि शिवचाप-भंजन, उग्र भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥ ४ ॥
गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य त्यक्त, श्रीसहित सौमित्रि-भ्राता।
संग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज, दुष्ट-वध-निरत, त्रैलोक्यत्राता ॥ ५ ॥
दंडकारण्य कृतपुण्य पावन चरण, हरण मारीच-मायाकुरंगं।
बालि बलमत्त गजराज इव केसरी, सुह्रद-सुग्रीव-दुख-राशि-भंगं ॥ ६ ॥
ऋक्ष, मर्कट विकट सुभट उभ्दट समर, शैल-संकाश रिपु त्रासकारी।
बद्धपाथोधि, सुर-निकर-मोचन, सकुल दलन दससीस-भुजबीस भारी ॥ ७ ॥
दुष्ट विबुधारि-संघात, अपहरण महि-भार, अवतार कारण अनूपं।
अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुण, सर्गुण, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥ ८ ॥
शेष-श्रुति-शारदा-शंभु-नारद-सनक गनत गुन अंत नहीं तव चरित्रं।
सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदा दासतुलसी-त्रास-निधि वहित्रं ॥ ९ ॥
भावार्थ :- सूर्यवंशरुपी कमल को खिलाने के लिये जो सूर्य हैं, करोड़ों कामदेवों के समान जिनकी सुन्दरता है, कलिकालरुपी सर्प को ग्रसने के लिये जो गरुड़ हैं, अपने प्रबल भुजदण्डों में जिन्होंने प्रचण्ड धनुष और बाण धारण कर रखे हैं, जो तरकस बाँधे हैं और जिनका बल असीम हैं ॥१॥ लाल कमल की पँखुड़ियों - जैसे जिनके नेत्र हैं, जो शोभा के धाम हैं, जिनके साँवरे शरीर की सुन्दर कान्ति मेघके समान है। जो तपे हुए सोने के समान पीताम्बर धारण किये हैं, जो शस्त्र-विद्या में निपुण और सिद्धों तथा देवताओं के उपास्य हैं और जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है ॥२॥
जो सम्पूर्ण सुन्दरता के स्थान हैं, सारा विश्व ही जिनकी मूर्ति है, जो बड़े ही बुद्धिमान् और रहस्यमय गुणवाले हैं, जिनकी अपार महिमा है, जिनको कोई भी नहीं जीत सकता और जिनकी लीला का पार कोई भी नहीं पा सकता, जिनको पहचानना बड़ा कठिन है, जो स्वर्ग और मोक्ष के स्वामी तथा आवागमनरुपी संसार के वृक्ष की जड़ काटने के लिये कुठार हैं ॥३॥ जो गौतम मुनि की स्त्री अहल्या को शाप से मुक्त करने वाले, विश्वामित्र के यज्ञ की यज्ञ की रक्षा करने में बड़े चतुर और अपने भक्तों का पक्ष करने वाले हैं, तथा राजा जनक की सभा में शिवजी के धनुष को तोड़कर महान् तेजस्वी एवं क्रोधी परशुरामजी के गर्व और महत्त्व को हरण करने वाले हैं ॥४॥
जिन्होंने पिता के वचनों का गौरव रखने के लिये, देवता भी जिसको बड़ी कठिनता से छोड़ सकते हैं, ऐसे राज्य को सहज में ही त्याग दिया और भाई लक्ष्मण तथा श्रीजानकीजी को साथ लेकर, अजन्मा परब्रह्म होकर भी नरलीला से तीनों लोकों की रक्षा के लिये रावणादि दुष्ट राक्षसों का संहार किया ॥५॥ जिन्होंने अपने पावन चरणकमलों से दण्डक वन को पवित्र कर दिया, कपट मृगरुपी मारीच का नाश कर दिया, जो बालिरुपी महान् बलसे मतवाले हाथी के संहार के लिये सिंहरुप हैं और सुग्रीव के समस्त दुःखोंका नाश करने वाले परम सुहद हैं ॥६॥
जिन्होंने भयंकर और बड़े भारी शूरवीर रीछ-बन्दरों को साथ लेकर संग्राम में कुम्भकर्ण-सरीखे पर्वत के समान आकारवाले योद्धाओं को डरा दिया, समुद्र को बाँध लिया, देवताओं के समूह को रावण के बन्धन से छुड़ा दिया और दस सिर तथा विशाल बीस भुजाओंवाले रावणका कुलसहित नाश कर दिया ॥७॥ देवताओं के शत्रु दुष्ट राक्षसों के समूह का, जो पृथ्वी पर भाररुप था, संहार करने के लिये अवतार लेने में उपमारहित कारणवाले, निर्मल, निर्दोष, अद्वैतरुप, वास्तव में निर्गुण, मायाको साथ लेकर सगुण, परब्रह्म नररुप राजराजेश्वर श्रीरामका मैं स्मरण करता हूँ ॥८॥
शेषजी, वेद, सरस्वती, शिवजी, नारद और सनकादि सदा जिनके गुण गाते हैं, परंतु जिनकी लीलाका पार नहीं पा सकते, वही शिवजी के प्यारे अयोध्यानाथ श्रीराम इस तुलसीदास को दुःखरुपी समुद्र से पार उतारने के लिये सदा-सर्वदा जहाजरुप हैं ॥९॥