श्रीराम स्तुति ५ - विनय पत्रिका ५१ - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ५१
श्रीराम स्तुति ५
देव
जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम-तरणि, तारुण्यतनु, तेजधामं।
सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विश्व-विश्राम, रामाभिरामं ॥ १ ॥
नीलनव-वारिधर-सुभग-शुभकांति, कटि पीत कौशेय वर वसनधारी।
रत्न-हाटक-जटित-मुकुट-मंडित-मौलि, भानु-शत-सदृश उद्योतकारी ॥ २ ॥
श्रवण कुंडल, भाल तिलक, भूरुचिर अति, अरुण अंभोज लोचन विशालं।
वक्र-अवलोक, त्रैलोक-शोकापहं, मार-रिपु-ह्रदय-मानस-मरालं ॥ ३ ॥
नासिका चारु सुकपोल, द्विज वज्रदुति, अधर बिंबोपमा, मधुरहासं।
कंठ दर, चिबुक वर, वचन गंभीरतर, सत्य-संकल्प, सुरत्रास-नासं ॥ ४ ॥
सुमन सुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदृल वनमाल उर भ्राजमानं।
भ्रमत आमोदवश मत्त मधुकर-निकर, मधुरतर मुखर कुर्वन्ति गानं ॥ ५ ॥
सुभग श्रीवत्स, केयूर, कंकण, हार, किंकणी-रटनि कटि-तट रसालं।
वाम दिसि जनकजासीन-सिंहासनं कनक-मृदुवल्लित तरु तमालं ॥ ६ ॥
आजानु भुजदंड कोदंड-मंडित वाम बाहु, दक्षिण पाणि बाणमेकं।
अखिल मुनि-निकर, सुर, सिद्ध, गंधर्व वर नमत नर नाग अवनिप अनेकं ॥ ७ ॥
अनघ अविछिन्न, सर्वज्ञ, सर्वेश, खलु सर्वतोभद्र-दाताऽसमाकं।
प्रणतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुण नौमि श्रीराम सौमित्रिसाकं ॥ ८ ॥
युगल पदपद्म, सुखसद्म पद्मालयं, चिन्ह कुलिशादि शोभाति भारी।
हनुमंत-ह्रदि विमल कृत परममंदिर, सदातुलसी-शरण शोकहारी ॥ ९ ॥
भावार्थ :- जानकीनाथ श्रीरघुनाथजी राग-द्वेषरुपी अन्धकार का नाश करने के लिये सूर्यरुप, तरुण शरीर वाले, तेज के धाम, सच्चिदानन्द, आनन्दकन्द की खानि, संसार को शान्ति देने वाले, परम सुन्दर हैं ॥१॥ जिनकी नवीन नील सजल मेघ के समान सुन्दर और शुभ कान्ति है, जो कटि-तट में सुन्दर रेशमी पीताम्बर धारण किये हैं, और जिनके मस्तकपर सैकड़ों सूर्यों के समान प्रकाश करने वाला रत्नजड़ित सुन्दर सुवर्ण-मुकुट शोभित हो रहा है ॥२॥
जो कानों में कुण्डल पहिने, भालपर तिलक लगाये, अत्यन्त सुन्दर भ्रुकुटि तथा लाल कमल के समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, तिरछी चितवन से देखते हुए, तीनों लोकों का शोक हरनेवाले और कामारि श्रीशिवजी के हदयरुपी मानसरोवर में विहार करने वाले हंसरुप हैं ॥३॥ जिनकी नासिका बड़ी सुन्दर हैं, मनोहर कपोल हैं, दाँत हीरे-जैसे चमकदार हैं, होठ लाल-लाल बिम्बाफल के समान हैं, मधुर मुसकान हैं, शंख के समान कण्ठ और परम सुन्दर ठोढ़ी हैं। जिनके वचन बड़े ही गम्भीर होते हैं, जो सत्यसंकल्प और देवताओं के दुःखों का नाश करनेवाले हैं ॥४॥
रंग-बिरंगे फूलों और नये तुलसी-पत्रोंकी कोमल वनमाला जिनके हदयपर सुशोभित हो रही है, उस मालापर सुगन्धके वश मतवाले भौंरोका समूह मधुर गुंजार करता हुआ उड़ रहा है ॥५॥ जिनके हदयपर सुन्दर श्रीवत्सका चिहन है, बाहुओं पर बाजूबन्द, हाथों में कंकण और गले में मनोहर हार शोभित हो रहा है, कटि-देश में सुन्दर तागड़ी का मधुर शब्द हो रहा है। सिंहासनपर वाम भाग में श्रीजानकीजी विराजमान हैं, जो तमालवृक्ष के समीप कोमल सुवर्ण-लता-सी शोभित हो रही हैं ॥६॥
जिनके भुजदण्ड घुटनोंतक लंबे हैं; बायें हाथ में धनुष और दाहिने हाथ में एक बाण हैं; जिनको सम्पूर्ण मुनिमण्डल, देवता, सिद्ध, श्रेष्ठ, मनुष्य, नाग और अनेक राजामहाराजागण प्रणाम करते हैं ॥७॥ जो पापरहित, अखण्ड, सर्वज्ञ, सबके स्वामी और निश्चयपूर्वक हमलोगों को कल्याण प्रदान करने वाले हैं; जो शरणागत भक्तों के कष्ट मिटाने की कलामें सर्वथा निपुण हैं, ऐसे लक्ष्मणजी सहित श्रीरामचन्द्रजी को मैं प्रणाम करता हूँ ॥८॥
जिनके दोनों चरणकमल आनन्द के धाम और कमला (लक्ष्मीजी) - के निवासस्थान हैं अर्थात् लक्ष्मीजी सदा उन चरणों की सेवा में लगी रहती हैं। वज्र आदि ४८ चिह्नों से जो अत्यन्त शोभा पा रहे हैं जिन्होंने भक्तवर श्रीहनुमानजी के निर्मल हदय को अपना श्रेष्ठ मन्दिर बना रखा है यानी श्रीहनुमानजी के हदय में यह चरणकमल सदा बसते हैं, ऐसे शोक हरनेवाले श्रीरामजी के चरणों की शरण में यह तुलसीदास हैं ॥९॥