श्रीराम स्तुति ६ - विनय पत्रिका ५२ - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ५२
श्रीराम स्तुति ६
देव
कोशलाधीश, जगदीश, जगदेकहित, अमितगुण, विपुल विस्तार लीला।
गायंति तव चरित सुपवित्र श्रुति-शेष-शुक-शंभु-सनकादि मुनि मननशीला ॥ १ ॥
वारिचर-वपुष धरि भक्त-निस्तारपर, धरणिकृत नाव महिमातिगुर्वी।
सकल यज्ञांशमय उग्र विग्रह क्रोड़, मर्दि दनुजेश उद्धरण उर्वी ॥ २ ॥
कमठ अति विकट तनु कठिन पृष्ठोपरी, भ्रमत मंदर कंडु-सुख मुरारी।
प्रकटकृत अमृत, गो, इंदिरा, इंदु, वृंदारकावृंद-आनंदकारी ॥ ३ ॥
मनुज-मुनि-सिद्ध-सुर-नाग-त्रासक, दुष्ट दनुज द्विज-धर्म-मरजाद-हर्त्ता।
अतुल मृगराज-वपुधरित, विद्दरित अरि, भक्त प्रहलाद-अहलाद-कर्त्ता ॥ ४ ॥
छलन बलि कपट-वटुरूप वामन ब्रह्म, भुवन पर्यंत पद तीन करणं।
चरण-नख-नीर-त्रेलोक-पावन परम, विबुध-जननी-दुसह-शोक-हरणं ॥ ५ ॥
क्षत्रियाधीश-करिनिकर-नव-केसरी, परशुधर विप्र-सस-जलदरूपं।
बीस भुजदंड दससीस खंडन चंड वेग सायक नौमि राम भूपं ॥ ६ ॥
भूमिभर-भार-हर, प्रकट परमातमा, ब्रह्म नररूपधर भक्तहेतू।
वृष्णि-कुल-कुमुद-राकेश राधारमण, कंस-बंसाटवी-धूमकेतू ॥ ७ ॥
प्रबल पाखंड महि-मंडलाकुल देखि, निंद्यकृत अखिल मख कर्म-जालं।
शुद्ध बोधैकघन, ज्ञान-गुणधाम, अज बौद्ध-अवतार वंदे कृपालं ॥ ८ ॥
कालकलिजनित-मल-मलिनमन सर्व नर मोह निशि-निबिड़यवनांधकारं।
विष्णुयश पुत्र कलकी दिवाकर उदित दासतुलसी हरण विपतिभारं ॥ ९ ॥
भावार्थ :- हे कोसलपति! हे जगदीश्वर! आप जगतके एकमात्र हितकारी हैं, आपने अपने अपार गुणों की बड़ी लीला फैलायी है। आपके परम पवित्र चरित्र को चारों वेद, शेषजी, शुकदेव, शिव, सनकादि और मननशील मुनि गाते हैं ॥१॥ आपने मत्स्यरुप धारण कर अपने भक्तों को पार करने के लिये (महाप्रलयके समय) पृथ्वी की नौका बनायी; आपकी अपार महिमा है। आप समस्त यज्ञों के अंशों से पूर्ण हैं, आपने बड़े भयंकर शरीर वाले हिरण्याक्ष दानव का मर्दन करके शूकाररुप से पृथ्वी का उद्धार किया ॥२॥
हे मुरारे! आपने अति भयानक कछुएका रुप धारण करके समुद्र - मन्थन के समय रसातल में जाते हुए मन्दराचल पहाड़ को अपनी कठिन पीठ पर रख लिया, उस समय उसपर पर्वत के घूमने से आप को खुजलाहटका - सा सुख प्रतीत हुआ था। समुद्र मथने पर आपने उसमें से अमृत, कामधेनु, लक्ष्मी और चन्द्रमा को उत्त्पन किया, इससे आपने देवताओं को बहुत आनंद दिया ॥३॥ आपने अतुल्य बलशाली नृसिंहरुप धारण करके मनुष्य, मुनि, सिद्ध, देवता और नागोंको दुःख देने वाले, ब्राह्मण और धर्मकी मर्यादा का नाश करने वाले दुष्ट दानव हिरण्यकशिरुप शत्रु को विदीर्ण कर भक्तवर प्रह्लाद को आह्लादित कर दिया ॥४॥
आपने वामन ब्रह्मचारि का रुप धारण कर राजा बलि को छलने के लिये पहिले तीन पैर पृथ्वी माँगी, पर नापते समय तीन पैर से सारा ब्रह्माण्डक नाप लिया। (नापनेके समय) आपके चरण-नखसे तीनों लोकों को पवित्र करनेवाला (गंगा) जल निकला। आपने बलिको पाताल में भेज और वह राज्य इन्द्रको देकर देवमाता अदितिका दुःसह शोक हर लिया ॥५॥ आपने सहस्त्रबाहु आदि अभिमानी क्षत्रिय राजारुपी हाथियों के समूह को विदीर्ण करने के लिये सिंहरुप और ब्राह्मणरुपी धान्यको हरा-भरा करने के लिये मेघरुप, ऐसा परशुराम-अवतार धारण किया और रामरुप से दस सिर तथा बीस भुजदण्डवाले रावण को प्रचण्ड बाणों से खण्ड-खण्ड कर दिया, ऐसे राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्जी को मैं प्रणाम करता हूँ ॥६॥
भूमिके भारी भार को हरने के लिये आप परमात्मा शुद्ध ब्रह्म होकर भी भक्तों के लिये मनुष्यरुप धारण करके प्रकट हुए, जो वृष्णीवंशरुपी कुमुदिनी को प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा, राधा जी के पति और कंसादिके वंशरूपी वन को जलाने के लिये अग्नि स्वरूप थे ॥७॥ प्रबल पाखण्ड - दम्भसे पृथ्वीमण्डलको व्याकुल देखकर आपने यज्ञादि सम्पूर्ण कर्मकाण्डरुपी जालका खण्डन किया, ऐसे शुद्ध - बोधस्वरुप, विज्ञानघन सर्व दिव्य - गुण - सम्पन्न, अजन्मा, कृपालु, बुद्ध भगवानकी मैं वन्दना करता हूँ ॥८॥
कलिकालजनित पापों से सभी मनुष्यों के मन मलिन हो रहे हैं। आप मोहरुपी रात्रि में म्लेच्छरुपी घने अन्धकार के नाश करने के लिये सूर्योदय की तरह विष्णुयश नामक ब्राह्मण के यहाँ पुत्ररुपसे कल्कि - अवतार धारण करेंगे! हे नाथ! आप तुलसीदास की विपत्ति के भारको दूर करें ॥९॥
ध्यान दो - जो कहते है कि राम कृष्ण अलग है और तुलसीदास जी राम कृष्ण में अंतर करते है? उनको तुलसीदास जी को यह विनय पत्रिका पढ़ना चाहिए। यहाँ तुलसीदास जी राधाजी के पति राम को अप्रत्यक्ष रूप से कह रहे है।