श्रीराम स्तुति ८ - विनय पत्रिका ५४ - तुलसीदास

श्रीराम स्तुति - विनय पत्रिका
॥ श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥
विनय पत्रिका ५४
श्रीराम स्तुति ८
देव
विश्व-विख्यात, विश्वेश, विश्वायतन, विश्वमरजाद, व्यालारिगामी।
ब्रह्म, वरदेश, वागीश, व्यापक, विमल विपुल, बलवान, निर्वानस्वामी ॥ १ ॥
प्रकृति, महतत्व, शब्दादि गुण, देवता व्योम, मरुदग्नि, अमलांबु, उर्वी।
बुद्धि, मन, इंद्रिय, प्राण, चित्तातमा, काल, परमाणु, चिच्छक्ति गुर्वी ॥ २ ॥
सर्वमेवात्र त्वद्रूप भूपालमणि! व्यक्तमव्यक्त, गतभेद, विष्णो।
भुवन भवदंग, कामारि-वंदित, पदद्वंद्व मंदाकिनी-जनक, जिष्णो ॥ ३ ॥
आदिमध्यांत, भगवंत! त्वं सर्वगतमीश, पश्यन्ति ये ब्रह्मवादी।
यथा पट-तंतु, घट-मृतिका, सर्प-स्त्रग, दारुकरि, कनक-कटकांगदादी ॥ ४ ॥
गूढ़, गंभीर, गर्वघ्न, गूढार्थवित, गुप्त, गोतीत, गुरु, ग्यान-ग्याता।
ग्येय, ग्यानप्रिय, प्रचुर गरिमागार, घोर-संसार-पर, पार दाता ॥ ५ ॥
सत्यसंकल्प, अतिकल्प, कल्पांतकृत, कल्पनातीत, अहि-तल्पवासी।
वनज-लोचन, वनज-नाभ, वनदाभ-वपु, वनचरध्वज-कोटि-लावण्यरासी ॥ ६ ॥
सुकर, दुःकर, दुराराध्य, दुर्व्यसनहर, दुर्ग, दुर्द्धर्ष, दुर्गार्त्तिहर्त्ता।
वेदगर्भार्भकादर्भ-गुनगर्व, अर्वांगपर-गर्व-निर्वाप-कर्त्ता ॥ ७ ॥
भक्त-अनुकूल, भवशूल-निर्मूलकर, तूल-अघ-नाम पावक-समानं।
तरलतृष्णा-तमी-तरणि, धरणीधरण, शरण-भयहरण, करुणानिधानं ॥ ८ ॥
बहुल वृंदारकावृंद-वंदारु-पद-द्वंद्व मंदार-मालोर-धारी।
पाहि मामीश संताप-संकुल सदा दास तुलसी प्रणत रावणारी ॥ ९ ॥
भावार्थ :- हे श्रीरामजी! आप विश्व में प्रसिद्ध, अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी, विश्वरुप, विश्व की मर्यादा और गरुड़पर जाने वाले हैं। आप ब्रह्म हैं। वर देनेवाले ब्रह्मादि देवताओं के और वाणी के स्वामी हैं। आप सर्वव्यापक, निर्मल, बड़े बलवान् और मोक्ष - पद के अधीश्वर हैं ॥१॥
मूल प्रकृति, महत्तत्व, शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध, सत्त्व, रज, तमोगुण; समस्त देवता; आकाश, वायु, अग्नि, निर्मल जल, पृथ्वी, बुद्धि, मन, दसों इन्द्रियाँ; प्राण, अपान, समान, व्यान, उदाननामक पंच प्राण; चित्त, आत्मा, काल, परमाणु और महान् चैतन्यशक्ति आदि सभी कुछ आप ही हैं। हे राजशिरोमणि! प्रकट और अप्रकट सब कुछ आप ही हैं; आप अभेदरुप से अखिल विश्व में रम रहे हैं। यह समस्त जगत आपके अंश में स्थित हैं। शिवजी आपके दोनों चरणकमलों की वन्दना करते हैं, श्री गंगा जी इन्हीं चरणों से निकली हैं। आप सर्वविजयी हैं ॥२ - ३॥
हे भगवन्! आप ही आदि, मध्य और अन्त हैं। आप सब में व्याप्त हैं। हे ईश! ब्रह्मवादी ज्ञानीजन आपको सबमें ऐसे ओत-प्रोत देखते हैं, जैसे वस्त्र में सूत, घड़े में मिट्टी, सर्प में माला, लकड़ी के बने हुए हाथी में लकड़ी और कड़े, बाजू आदि गहनों में सोना ओत-प्रोत हैं ॥४॥ इस प्रकार आप अत्यन्त गूढ़, गम्भीर, दर्पहारी, गुप्त रहस्य के ज्ञाता, गुप्त, मन-इन्द्रियों से अतीत, सबके गुरु, ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेयस्वरुप, ज्ञानप्रिय, महान् गौरव के भण्डार और इस घोर भवसागर से पार उतार देने वाले हैं ॥५॥
आपका संकल्प सत्य है, आप प्रलय और महाप्रलय करने वाले हैं। मन-बुद्धि से आपकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। आप शेषनाग की शय्यापर निवास करने वाले हैं। आपके कमल के समान नेत्र हैं, आपकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है, आपके शरीर की कान्ति मेघ के समान श्याम है और करोड़ों कामदेवों के समान आप सुन्दरता की राशि हैं ॥६॥ आप भक्तों के लिये सुलभ, दुष्टों के लिये दुर्लभ हैं, आपकी आराधना में (परीक्षा के लिये) बड़े-बड़े कष्ट आते हैं, आप भक्तों के सारे दुर्गुणों का नाश कर देते हैं, बड़े दुर्गम (बड़ी कठिनाईसे मिलते हैं) दुर्द्धर्ष हैं और कठिन दुःखों के हरने वाले हैं। आप ब्रह्माजी के पुत्र सनकादि को अपनी परा-अपरा विद्या का जो गर्व था, उसे हरण करने वाले हैं ॥७॥
आप भक्तों पर प्रसन्न रहने वाले, जन्म-मरणरुप संसार के क्लेश को जड़से उखाड़ने वाले हैं। आपका रामनाम पापरुपी रुई को जलाने के लिये अग्निरुप है। चंचल तृष्णारुपी रात्रिका नाश करने के लिये आप सूर्य हैं, पृथ्वी को धारण करने वाले, शरणागत का भय हरने वाले और करुणा के स्थान हैं ॥८॥ आपके चरणयुगलोंली बहुत - से देवताओं के समूह वन्दना करते हैं। आप मन्दार की माला हदय पर धारण किये रहते हैं। हे रावण के शत्रु श्रीरामजी! सदा सन्ताप से व्याकुल मैं तुलसीदास आपकी शरण हूँ। हे नाथ! मेरी रक्षा किजीये ॥९॥